नई दिल्ली: दिल्ली में पढ़ने आने वाला कोई छात्र जब पहली बार इस शहर में कदम रखता है, तो उसके सामने सबसे बड़ा सवाल अक्सर यह नहीं होता कि कॉलेज कैसा है या कोचिंग कितनी अच्छी है। सबसे पहले उसे एक कमरा चाहिए होता है—ऐसा कमरा जो कॉलेज या कोचिंग के पास हो, जेब पर भारी न पड़े और जहां वह चैन से रह सके। लेकिन इस तलाश में एक सवाल अक्सर पीछे छूट जाता है—जिस कमरे को वह अपना घर समझकर किराये पर ले रहा है, क्या वह वाकई सुरक्षित है? देश के अलग-अलग हिस्सों से हर साल दो से तीन लाख छात्र दिल्ली पढ़ाई और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए आते हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, राजस्थान, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल समेत कई राज्यों के परिवार अपने बच्चों को दिल्ली भेजते हैं। कई परिवारों के लिए यह सिर्फ पढ़ाई का खर्च नहीं होता, बल्कि वर्षों की बचत और उम्मीदों का निवेश होता है। छात्र भी जानते हैं कि दिल्ली में रहना सस्ता नहीं है। कॉलेज या कोचिंग की फीस अलग, आने-जाने का खर्च अलग और उसके ऊपर कमरा या PG। ऐसे में जब कोई छात्र कम बजट में रहने की जगह खोजता है, तो वह अक्सर सुरक्षा से ज्यादा किराया, लोकेशन और सुविधाओं को प्राथमिकता देता है।

सत्य निकेतन हादसे से फिर उठे सवाल

6 सितंबर 2026 को दक्षिण-पश्चिम दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में छात्रों के रहने वाली एक बहुमंजिला इमारत गिरने की घटना ने इसी सवाल को फिर सामने ला दिया है—दिल्ली में पढ़ने आए छात्रों के लिए रहने की जगह कितनी सुरक्षित है? हादसे के बाद मलबे में कई लोगों के दबे होने की आशंका जताई गई और राहत-बचाव एजेंसियां मौके पर पहुंचीं। NDRF समेत कई एजेंसियां बचाव अभियान में जुटीं। लेकिन इस घटना ने सिर्फ आज के हादसे की चिंता नहीं बढ़ाई, बल्कि उन तमाम पुराने हादसों की याद भी दिला दी, जिनमें कभी आग लगी, कभी इमारत गिरी और कभी छात्रों को जान बचाने के लिए खिड़की या पड़ोसी की छत का सहारा लेना पड़ा।

सत्य निकेतनः पहले भी गिर चुकी है इमारत

सत्य निकेतन में चार साल पहले भी गिर चुकी है इमारत सत्य निकेतन का नाम इससे पहले भी एक इमारत गिरने के हादसे से जुड़ चुका है। 25 अप्रैल 2022 को इसी इलाके में एक तीन मंजिला मकान ढह गया था। उस वक्त इमारत में निर्माण और नवीनीकरण का काम चल रहा था। मलबे में पांच मजदूर फंस गए थे। बचाव दल ने उन्हें बाहर निकाला, लेकिन दो मजदूरों की जान नहीं बचाई जा सकी। हादसे की जांच के दौरान यह बात सामने आई थी कि पुरानी इमारत को PG में बदलने के लिए उसका नवीनीकरण किया जा रहा था और कथित तौर पर कुछ संरचनात्मक बदलाव किए गए थे। उस समय एक वरिष्ठ अग्निशमन अधिकारी ने भी इमारत की स्थिति को लेकर चिंता जताई थी। यही बात इस पूरे मामले को और गंभीर बनाती है।

आग भी है दूसरा बड़ा खतरा

जब किसी पुराने मकान को छात्रों के रहने के लिए PG में बदला जाता है, तो क्या सिर्फ कमरे बढ़ते हैं या सुरक्षा भी बढ़ती है? 2022 के हादसे के चार साल बाद उसी इलाके में एक और बड़ी घटना सामने आने के बाद यह सवाल पूछना जरूरी हो जाता है कि दिल्ली के छात्र इलाकों में निजी हॉस्टल और PG की इमारतों की नियमित जांच आखिर कितनी होती है। मुखर्जी नगर में आग लगी तो छात्राओं को छतों से निकालना पड़ा इमारत गिरने का खतरा अपनी जगह है, लेकिन दिल्ली के छात्र इलाकों में आग भी एक बड़ा खतरा बन चुकी है।

सितंबर 2023 में मुखर्जी नगर के एक गर्ल्स PG में आग लग गई थी। उस वक्त इमारत में 35 से ज्यादा छात्राएं मौजूद थीं। आग सीढ़ियों के पास लगी और तेजी से ऊपर की ओर फैल गई। इसके बाद जो हुआ, वह किसी भी छात्र और उसके परिवार को डराने के लिए काफी था। छात्राओं को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए फायर सर्विस को काफी मशक्कत करनी पड़ी। हादसे पर प्रकाशित एक रिपोर्ट में PG में रहने वाले छात्रों ने हद से ज्यादा लोगों को रखने, संकरी सीढ़ियों, खराब विद्युत वायरिंग, कम वेंटिलेशन और अग्नि सुरक्षा की कमी जैसी समस्याएं बताई थीं रिपोर्ट के मुताबिक इमारत में केवल एक सीढ़ी थी। कई छात्राओं को पड़ोसी इमारत और छत के रास्ते बाहर निकाला गया। सोचिए, जिस कमरे में एक छात्रा अपने माता-पिता से फोन पर बात कर रही होगी, परीक्षा की तैयारी कर रही होगी या अगले दिन की क्लास के बारे में सोच रही होगी, कुछ ही मिनट बाद उसे अपनी जान बचाने के लिए छत के रास्ते भागना पड़ा। बाद की रिपोर्टों में इमारत में पर्याप्त फायर सेफ्टी इंतजाम नहीं होने और सिर्फ एक escape route होने जैसी कमियों की बात सामने आई थी।

पीजी-हॉस्टल बना बड़ा कारोबार

यह सिर्फ एक PG की कहानी नहीं है। यह सवाल है कि जब किसी इमारत में दर्जनों छात्र रहते हैं, तो आपात स्थिति में बाहर निकलने का रास्ता कितना सुरक्षित है? छात्र जहां जाते हैं, वहां खड़ा हो जाता है एक पूरा कारोबार। दिल्ली में छात्र जहां बड़ी संख्या में पहुंचते हैं, वहां उनके आसपास एक पूरा कारोबार खड़ा हो जाता है। मुखर्जी नगर हो, नेहरू विहार, इंद्रा विहार, सत्य निकेतन या कोई दूसरा छात्र इलाका—कुछ ही समय में सामान्य मकान PG, हॉस्टल, फ्लैट या छोटे-छोटे कमरों में बदलने लगते हैं। मकान मालिक के लिए यह एक कारोबार है। छात्र के लिए यह उसका घर। और इन दोनों के बीच सबसे कमजोर कड़ी अक्सर वही छात्र होता है, जो दूसरे शहर से पहली बार दिल्ली आया है। उसे न भवन निर्माण के नियम पता होते हैं, न Fire NOC की जानकारी होती है और न यह पता होता है कि जिस मकान में वह रह रहा है, उसमें कितने लोगों को रखने की अनुमति है। उसे बस इतना पता होता है कि कॉलेज या कोचिंग 10-15 मिनट की दूरी पर है और कमरा उसकी जेब के हिसाब से है। यहीं से असली समस्या शुरू होती है। कमरा ढूंढते समय छात्र सबसे पहले क्या देखता है?

क्या है छात्रों की मजबूरी

दिल्ली आने वाले ज्यादातर छात्रों के सामने लगभग एक जैसी प्राथमिकताएं होती हैं। पहली—कॉलेज या कोचिंग के पास कमरा मिले। दूसरी—किराया बजट में हो। तीसरी—खाना, Wi-Fi, AC और दूसरी सुविधाएं मिल जाएं। सुरक्षा? अक्सर यह सवाल तब आता है जब कमरा पसंद किया जा चुका होता है। कई छात्र एडवांस में कई महीनों का किराया तक जमा कर देते हैं। मुखर्जी नगर की 2023 की रिपोर्टों में तीन से छह महीने तक का एडवांस दिए जाने की बात सामने आई थी। ऐसे में अगर कुछ दिन बाद छात्र को पता चलता है कि इमारत में सुरक्षा व्यवस्था ठीक नहीं है, तो उसके लिए कमरा छोड़ देना भी आसान नहीं होता। एक तरफ परिवार का पैसा लगा है, दूसरी तरफ परीक्षा या कॉलेज की तैयारी। नया कमरा ढूंढना मतलब फिर एडवांस, फिर सामान शिफ्ट करना और कई बार कोचिंग से दूर जाना। यानी छात्र जानता है कि जगह पूरी तरह सुरक्षित नहीं है, फिर भी उसके पास विकल्प सीमित होते हैं।

बाहर से आए छात्र को पता ही नहीं होता कि खतरा कहां है किसी PG में रहने से पहले क्या आपने कभी मकान मालिक से पूछा है कि इस इमारत का नक्शा स्वीकृत है या नहीं? क्या आपने पूछा कि यहां कितने लोगों के रहने की अनुमति है? क्या Fire NOC है? क्या दूसरी emergency exit है? क्या बिजली की वायरिंग सुरक्षित है? क्या बिल्डिंग की structural जांच हुई है? अधिकांश छात्रों का जवाब शायद ‘नहीं’ होगा। और इसकी वजह लापरवाही से ज्यादा जानकारी की कमी है। एक 19-20 साल का छात्र, जो पहली बार अपने घर से बाहर आया है, उससे यह उम्मीद करना कि वह बिल्डिंग कोड और फायर सेफ्टी नियमों की जांच करेगा, आसान नहीं है। उसके माता-पिता भी कई बार सिर्फ इतना देखते हैं कि कमरा ठीक है, इलाका ठीक है और आसपास दूसरे छात्र रहते हैं।


कोचिंग सेंटरों में भी सुरक्षा से खिलवाड़

असली सुरक्षा उन चीजों में छिपी होती है जो पहली नजर में दिखाई ही नहीं देतीं। राजेंद्र नगर ने भी चेताया था दिल्ली में छात्रों की सुरक्षा का सवाल सिर्फ PG तक सीमित नहीं है। जुलाई 2024 में ओल्ड राजेंद्र नगर में एक कोचिंग सेंटर के बेसमेंट में पानी भरने से UPSC की तैयारी कर रहे तीन छात्रों की मौत हो गई थी। उस हादसे ने पूरी व्यवस्था को झकझोर दिया था। कोचिंग सेंटर, लाइब्रेरी, हॉस्टल, PG और आसपास की रिहायशी इमारतें—इन सबको मिलाकर दिल्ली के कई हिस्सों में छात्रों की जरूरत के आसपास एक बड़ा commercial ecosystem बन चुका है। लेकिन सवाल यह है कि इस कारोबार की रफ्तार के साथ सुरक्षा व्यवस्था भी उतनी ही तेजी से आगे बढ़ी या नहीं? राजेंद्र नगर हादसे ने दिखाया कि किसी छात्र की सुरक्षा सिर्फ उसके कमरे की चार दीवारों तक सीमित नहीं है। जिस रास्ते से वह कोचिंग जाता है, जिस लाइब्रेरी में पढ़ता है और जिस बिल्डिंग में रहता है—हर जगह सुरक्षा जरूरी है।

बढता किराया, घटती सुरक्षा

सवाल यह है कि किराया बढ़ता गया, लेकिन क्या सुरक्षा भी बढ़ी? दिल्ली के प्रमुख student hubs में एक सामान्य मकान को छोटे कमरों में बांटकर ज्यादा से ज्यादा छात्रों को रखने का चलन कोई नई बात नहीं है। जितने ज्यादा बेड, उतनी ज्यादा कमाई। लेकिन सवाल है—क्या बेड बढ़ाने के साथ बिल्डिंग की क्षमता भी बढ़ाई जाती है? अगर जिस जगह को चार लोगों के लिए बनाया गया था, वहां आठ-दस लोग रहने लगें तो समस्या सिर्फ जगह की कमी नहीं है। बिजली का लोड बढ़ सकता है। आग लगने पर बाहर निकलना मुश्किल हो सकता है। सीढ़ियों पर भीड़ बढ़ सकती है। Emergency में लोगों को निकालने में ज्यादा समय लग सकता है। और अगर पहले से ही इमारत में कोई structural समस्या है, तो अतिरिक्त भार जोखिम को और बढ़ा सकता है।

नियम-कानून तो हैं लेकिन निगरानी नहीं

PG की सुरक्षा को केवल मकान मालिक और छात्र के बीच का निजी मामला मानकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं है। नियम हैं, लेकिन सवाल निगरानी का है, दिल्ली में भवन निर्माण और अग्नि सुरक्षा से जुड़े नियम मौजूद हैं। लेकिन किसी नियम का होना और उसका जमीन पर लागू होना दो अलग बातें हैं। हर बड़े हादसे के बाद जांच होती है। कमियां सामने आती हैं। नोटिस जारी होते हैं। कार्रवाई की बात होती है। फिर कुछ समय बाद सब सामान्य हो जाता है।

यही वजह है कि अब सवाल यह नहीं होना चाहिए कि हादसे के बाद किस पर कार्रवाई होगी? सवाल यह होना चाहिए कि हादसा होने से पहले खतरे की पहचान क्यों नहीं हुई? अगर किसी इलाके में हजारों छात्र PG और हॉस्टल में रह रहे हैं, तो वहां नियमित structural और fire safety audit क्यों नहीं होना चाहिए? हर PG की ‘Safety Rating’ क्यों नहीं? इस समस्या का एक व्यावहारिक समाधान यह हो सकता है कि दिल्ली में छात्रों के लिए चल रहे PG और निजी हॉस्टल का एक Student Accommodation Safety Registry बनाया जाए। जिस तरह ऑनलाइन कमरा खोजते समय छात्र किराया, AC, खाना और Wi-Fi देखता है, उसी तरह उसे सुरक्षा की जानकारी भी दिखाई दे। मसलन— Fire Safety Certificate है या नहीं Building approval/occupancy status कितने लोगों की अनुमति है। Emergency exit कितने हैं। Fire extinguisher और alarm की स्थिति बिजली की सुरक्षा CCTV और emergency contact नंबर क्या हैं। इमारत का structural ऑडिट कब हुआ। पीजी कौन चलाता है और उसका मालिक कौन है।

ज़रूरी है Student Housing Safety Mission

वहीं सरकार का दायित्व है कि छात्रों की शिकायत के लिए कोई हेल्पलाइन की सुविधा भी होनी चाहिए। दिल्ली को शायद इस समस्या को अलग-अलग हादसों की तरह देखने के बजाय एक व्यापक Student Housing Safety Mission के रूप में देखना होगा। जानकारों के मुताबिक कॉलेज और विश्वविद्यालयों के आसपास के सभी बड़े PG clusters की mapping हो। हर इमारत की क्षमता दर्ज हो। नियमित रूप से Fire और structural audit होना चाहिए। साथ ही अवैध रूप से बदली गई इमारतों की पहचान हो।

और सबसे महत्वपूर्ण बात—छात्र को यह अधिकार मिले कि वह किराया देने से पहले अपने संभावित कमरे की सुरक्षा स्थिति जान सके।

क्योंकि दिल्ली आने वाला छात्र यहां सिर्फ कमरा किराये पर नहीं लेता। वह अपने परिवार की उम्मीदें लेकर आता है।वह प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करता है, कॉलेज जाता है, उसका परिवार उसकी नौकरी का सपना देखता है और कई बार वर्षों तक इसी शहर में अपने भविष्य के लिए संघर्ष करता है। उसके लिए PG सिर्फ चार दीवारें नहीं है। वह उसका घर है। जहां वह अपने सपनों के घरोंदे का ख्वाब देखता है। इसीलिए किसी छात्र के लिए घर चुनते वक्त सबसे पहली शर्त किराया या Wi-Fi नहीं, सुरक्षा होनी चाहिए।