Coal Stock at Power Plants : भारत के सामने इस समय एक बड़ा और गंभीर संकट खड़ा होता नजर आ रहा। बिजली घरों में कोयले का भंडार पांच साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है। हालत है कि देश के करीब आधे बिजली संयंत्रों में जरूरत से बहुत कम कोयला बचा है। सरकार ने पहले विदेश से कोयला मंगाकर इस कमी को पूरा करने की सोची थी, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें आसमान छू रही हैं और हमारा रुपया भी कमजोर पड़ रहा है, जिससे बाहर से कोयला खरीदना देश के लिए बहुत ज्यादा महंगा साबित हो रहा है। यही वजह है कि सरकार ने आयात वाली इस योजना को पूरी तरह टाल दिया है।
आखिर क्यों पैदा हुई कोयले की ऐसी किल्लत?
इस संकट के पीछे कई बड़ी वजहें जुड़ी हुई हैं:-
मौसम की मार : इस बार मानसून कमजोर रहा, जिसके चलते गर्मी का असर सामान्य से बहुत ज्यादा लंबे समय तक बना रहा। लंबे समय तक गर्मी रहने के कारण लोगों ने घरों और दफ्तरों में कूलिंग का इस्तेमाल ज्यादा किया, जिससे बिजली की खपत अचानक तेजी से बढ़ गई।
सिंचाई और खेती का दबाव : सूखे जैसी स्थिति और कम बारिश के कारण किसानों को खेतों की सिंचाई के लिए भी ज्यादा बिजली की जरूरत पड़ी।
जल विद्युत उत्पादन में गिरावट : बारिश कम होने की वजह से नदियों और बांधों में पानी का स्तर घट गया, जिससे जल विद्युत (हाइड्रो पावर) का उत्पादन बहुत कम हो गया।
कोयले पर बढ़ता दबाव : जब पानी से बिजली कम बनी, तो देश की बिजली की मांग को पूरा करने के लिए सारा दारोमदार पूरी तरह से कोयले से चलने वाले पावर प्लांटों पर आ गया। इन सब वजहों का नतीजा यह निकला कि सितंबर के महीने में देश के अंदर बिजली की कमी पिछले एक दशक के सबसे खराब और डरावने स्तर पर जा पहुंची।
अक्टूबर में थोड़ी राहत, लेकिन खतरा टला नहीं
राहत की बात बस इतनी है कि अक्टूबर के महीने में कोयले के स्टॉक के घटने की रफ्तार थोड़ी धीमी पड़ी है। ब्लूमबर्ग और बिजली मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक 1 अक्टूबर से 17 अक्टूबर के बीच बिजली संयंत्रों का औसत स्टॉक हर दिन करीब 48,000 टन कम हुआ है। यह रफ्तार सितंबर के मुकाबले लगभग पांच गुना कम है। सरकार और मौसम विभाग को पूरी उम्मीद है कि जैसे-जैसे आने वाले दिनों में तापमान गिरेगा, बिजली की मांग में भी कमी आएगी और पावर प्लांटों में कोयला दोबारा इकट्ठा होना शुरू हो जाएगा। अगले दो हफ्तों में तापमान में थोड़ी गिरावट आने की संभावना जताई जा रही है। वैसे, यह अभी भी सामान्य से थोड़ा ऊपर ही बना रह सकता है।
भारत की चिंता बढ़ाने वाली दो बड़ी मुश्किलें
कोयला की आसमान छूती कीमतें : भारत ने अतीत में भी कोयले की कमी से निपटने के लिए विदेशों से कोयला मंगाया था। लेकिन इस बार दिक्कत यह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में थर्मल कोयला तीन साल के सबसे ऊंचे दामों पर बिक रहा है।
रुपये की कमजोरी और महंगे आयात : डॉलर के मुकाबले रुपये के कमजोर होने की वजह से विदेशों से किसी भी चीज को खरीदना बहुत महंगा पड़ गया है। इसके अलावा, कच्चे तेल की ऊंची कीमतों ने भी देश के ऊर्जा आयात के बजट पर भारी दबाव बना रखा है। इन सब वजहों के चलते सरकार ने विदेश का रुख करने के बजाय अपने ही देश के अंदर उत्पादन और सप्लाई को मजबूत करने का रास्ता चुना है।
इस संकट से निपटने के लिए सरकार ने क्या कड़े कदम उठाए हैं?
स्थिति से निपटने के लिए सरकार ने कई जरूरी और बड़े फैसले लिए हैं:-
कैप्टिव प्लांट्स को आदेश : सरकार ने निर्देश के तहत 100 से अधिक कैप्टिव कोयला आधारित बिजली घरों को 1 अक्टूबर से इस साल के आखिरी तक पूरी क्षमता के साथ चलाने को कहा है, ताकि आगामी दिनों में बिजली की मांग में कोई कमी न आए।
उत्पादन और ढुलाई में तेजी : कोयला मंत्रालय के अनुसार इस महीने की शुरुआत से बिजली सेक्टर को रोजाना मिलने वाले कोयले की आपूर्ति में सितंबर के मुकाबले 36 प्रतिशत की बड़ी बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
रेलवे की बड़ी भूमिका : रेलवे के जरिए कोयले की ढुलाई को बढ़ाकर औसतन 465 से ज्यादा रेक प्रतिदिन कर दिया गया है। इतना ही नहीं, लगातार तीन दिनों तक रोज 470 रेक पहुंचाने के लक्ष्य को भी सफलतापूर्वक हासिल किया गया है। सड़क मार्ग और परिवहन के दूसरे साधनों से भी माल की आवाजाही को बेहतर किया गया है। सरकार का ऐसा मानना है कि रोजाना 465 से 475 रेक कोयले की ढुलाई इसी तरह होती रही तो न सिर्फ स्टॉक स्थिर हो जाएगा, बल्कि त्योहारों, आने वाली सर्दियों और अगली गर्मियों की मांग के लिए भी भरपूर भंडार सुरक्षित किया जा सकेगा।
कितनी खतरनाक थी और अब कैसी है स्थिति?
केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA) के पास मौजूद आंकड़ों के मुताबिक 8 अक्टूबर तक देश के कुल 190 में से 87 कोयला आधारित बिजली संयंत्रों के पास 'क्रिटिकल स्टॉक' (बेहद कम कोयला) बचा था। तुलना करें तो सितंबर के पहले हफ्ते में ऐसे खस्ताहाल संयंत्रों की संख्या केवल 50 थी। इन 87 संयंत्रों के पास कुल मिलाकर 2.06 करोड़ टन कोयला बचा था, जो उनके लिए तय 6.12 करोड़ टन के अनुशंसित स्टॉक का महज 33 प्रतिशत हिस्सा ही है। वैसे, बिजली मंत्रालय ने जनता की घबराहट को दूर करने के लिए यह साफ किया है कि किसी भी प्लांट को क्रिटिकल स्टॉक की श्रेणी में डालने का कतई यह मतलब नहीं है कि वहां कोयला कल ही पूरी तरह खत्म हो जाएगा या बिजली का उत्पादन रातों-रात ठप पड़ जाएगा। कम स्टॉक वाले ऐसे सभी पावर प्लांटों पर सरकार की पैनी नजर है। जरूरत पड़ने पर दूसरे संयंत्रों से तालमेल बिठाकर वहां कोयले की आपूर्ति तुरंत पहुंचाई जा रही।