लद्दाख में संवैधानिक संरक्षण और राजनीतिक अधिकारों के मुद्दे पर केंद्र सरकार के साथ चल रही वार्ता में बने अवरोध के बीच, नागरिक समाज मंच ने वर्तमान वार्ता प्रक्रिया की सार्थकता पर प्रश्न चिन्ह लगा दिए हैं। फोरम का कहना है कि लगातार टल रही बातचीत से लोगों का भरोसा कमजोर हो रहा है। उसने केंद्र सरकार और लद्दाख प्रशासन से मांग की है कि क्षेत्र के सभी आठ जिलों में पंचायत और लद्दाख स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषदों (LAHDC) के चुनाव जल्द कराए जाएं। 

बातचीत में देरी से लद्दाख के हित प्रभावित होने का आरोप

22 अक्टूबर को लेह में हुई बैठक के बाद जारी प्रस्ताव में फोरम ने कहा कि केंद्र के साथ संवाद के जरिए जमीन, रोजगार, संस्कृति और पर्यावरण की सुरक्षा सुनिश्चित करने का उद्देश्य पूरा नहीं हो पा रहा है। संगठन ने आरोप लगाया कि बातचीत में बार-बार बदलती मांगों और देरी के कारण सहमति बनाने की कोशिशों को नुकसान पहुंचा है। फोरम ने लेह एपेक्स बॉडी और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (KDA) की भूमिका की भी आलोचना की। उसका दावा है कि बातचीत कुछ नेताओं और संगठनों तक सीमित होती जा रही है, जिससे लद्दाख के विभिन्न जिलों और समुदायों के हितों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं हो रहा। ये आरोप फोरम की ओर से जारी प्रस्ताव में लगाए गए हैं। 

सभी आठ जिलों में चुनाव कराने की मांग

फोरम ने लेह, कारगिल, नुब्रा, शाम, चांगथांग, जांस्कर, द्रास और संकू में स्थानीय निकाय चुनाव कराने की मांग की है। संगठन के मुताबिक, निर्वाचित पंचायतों और जिला परिषदों के जरिए लोगों को अपने क्षेत्र के विकास से जुड़े फैसलों में सीधी भागीदारी मिल सकेगी। फोरम का कहना है कि स्थानीय स्तर पर मजबूत लोकतांत्रिक संस्थाएं होने से जमीन, प्राकृतिक संसाधनों, व्यापार, पर्यटन, खनन लाइसेंस और स्थानीय रोजगार से जुड़े मामलों में क्षेत्र के लोगों के हितों की रक्षा की जा सकती है। उसने यह भी कहा कि हर जिले की अपनी सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान है, इसलिए सभी क्षेत्रों को उचित प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। 

अनुच्छेद 371 जैसी संवैधानिक सुरक्षा पर जोर

लद्दाख में लंबे समय से जमीन, नौकरी, संस्कृति और पर्यावरण की रक्षा के लिए विशेष संवैधानिक प्रावधानों की मांग की जा रही है। फोरम ने भी अनुच्छेद 371 जैसी सुरक्षा व्यवस्था और स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषदों को अधिक अधिकार देने की वकालत की है। संगठन का मानना है कि व्यापक संवैधानिक व्यवस्था तैयार होने में समय लग सकता है। इसलिए तब तक स्थानीय निकायों के चुनाव और जिला परिषदों को मजबूत करना जरूरी है, ताकि क्षेत्र के लोगों को लंबे समय तक लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के अभाव में न रहना पड़े। 

छह साल से पंचायतों के अभाव पर उठाए सवाल

फोरम ने दावा किया कि लद्दाख में पिछले छह वर्षों से पंचायतों के अभाव ने गांवों के विकास कार्यों और मनरेगा जैसी योजनाओं के क्रियान्वयन को प्रभावित किया है। संगठन के मुताबिक, निर्वाचित ग्राम पंचायतें स्थानीय जरूरतों को समझने और सरकारी योजनाओं का लाभ लोगों तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाती हैं। उसने लेह एपेक्स बॉडी के पुनर्गठन की भी मांग की है। फोरम चाहता है कि इसमें सभी संबंधित जिलों के लोकतांत्रिक रूप से चुने गए प्रतिनिधियों के साथ महिलाओं, युवाओं, आदिवासी समुदायों, मठों और सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को भी जगह मिले। 

केंद्र से समाधान निकालने की अपील

फोरम ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से अपील की है कि लद्दाख की विभिन्न सामाजिक और क्षेत्रीय आवाजों को बातचीत में शामिल किया जाए। संगठन के अनुसार, पंचायत और पहाड़ी विकास परिषद के चुनाव तत्काल कराना स्थायी संवैधानिक समाधान की दिशा में एक व्यावहारिक अंतरिम कदम हो सकता है। इस बीच, केंद्र और लद्दाख के मौजूदा प्रतिनिधि संगठनों के बीच संवैधानिक सुरक्षा तथा अधिक अधिकारों वाले निर्वाचित निकाय को लेकर मतभेद बने हुए हैं। ऐसे में बातचीत को आगे बढ़ाना और क्षेत्र के सभी समुदायों को भरोसे में लेना अहम चुनौती बनी हुई है।