Sonia Gandhi Instagram Account : कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी ने आज सोशल मीडिया की दुनिया में कदम रखते हुए अपना आधिकारिक इंस्टाग्राम अकाउंट लॉन्च कर दिया है। अपने इस डेब्यू के साथ उन्होंने अपनी आने वाली बहुप्रतीक्षित आत्मकथा ‘Belonging: A Journey of Love’ का वीडियो भी शेयर किया है। किताब 10 नवंबर को दुनिया के सामने आएगी। सोनिया गांधी ने आज सुबह 9 बजे अपनी पहली पोस्ट शेयर की। इसमें उन्होंने लिखा-नमस्कार, मैं अपनी किताब आप सभी के साथ साझा करके बेहद खुश हूं। यह प्यार, कर्तव्य, अपनों को खोने और अपनेपन की तलाश करने की एक दास्तान है। मैं इसे आप सबके साथ बांटने के लिए पूरी तरह उत्सुक हूं।

वीडियो में प्रियंका और कुछ करीबी लोग

वीडियो में सोनिया बेहद करीबी लोगों और बेटी प्रियंका गांधी के साथ हंसती-मुस्कुराती नजर आ रही हैं। वीडियो में एक प्यारा पल तब आता है, जब प्रियंका अपनी मां को प्यार से मिठाई खिलाती हैं। इस आत्मकथा में सोनिया ने अपने शुरुआती जीवन यानी इटली के वेनेटो क्षेत्र में बीते बचपन से कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के दिनों और राजीव गांधी से हुई पहली मुलाकात तक का खुलकर जिक्र किया है। नेहरू-गांधी परिवार में बहू बनकर आने और परिवार में घटी भयानक त्रासदियों के बाद पूरी तरह बदल चुकी अपनी जिंदगी के पन्नों को भी पलटा है।

क्या कुछ समेटे हुए है ‘Belonging’ की कहानी?

इस किताब की शुरुआत युद्ध के बाद के इटली के वेनेटो इलाके में उनके शुरुआती दिनों से होती है। इसके बाद किताब का रुख कैंब्रिज की तरफ मुड़ता है, जहाँ साल 1965 में उनकी मुलाकात भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के पोते राजीव गांधी से हुई थी। आत्मकथा में राजीव गांधी के साथ उनकी शादी और उनकी सास यानी देश की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से अपनी पहली मुलाकात का दिलचस्प वर्णन भी है। इसमें विदेशी जमीन से आकर भारत की संस्कृति में ढलने के उनके सफर को भी बहुत करीब से दिखाया गया है, जिसमें हिंदी भाषा सीखना, पारंपरिक साड़ी पहनना और यहाँ के खानपान व रहन-सहन को अपनाना शामिल है। किताब में उन गहरे जख्मों और हादसों का भी जिक्र है जिन्होंने पूरे गांधी परिवार की तकदीर ही बदल दी। इनमें एक विमान हादसे में संजय गांधी की अचानक मौत, साल 1984 में इंदिरा गांधी की निर्मम हत्या और साल 1991 में राजीव गांधी की देश के लिए दी गई शहादत जैसे दर्दनाक वाकया शामिल हैं।

राजनीति के उतार-चढ़ाव और कांग्रेस की कमान

आत्मकथा के पन्नों में साल 2004 के लोकसभा चुनाव के बाद के राजनीतिक घटनाक्रम को भी जगह मिली है। उस चुनाव में कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन ने शानदार जीत हासिल की थी। इसके बाद सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री बनने के प्रस्ताव को खुद ठुकरा दिया था और पार्टी तथा गठबंधन का कमान अपने हाथों में संभाली थी। इसके बाद कांग्रेस नीत यह गठबंधन लगातार 10 साल तक देश की सत्ता पर काबिज रहा। तारीखों के पन्नों को पलटें तो साल 1991 में राजीव गांधी की हत्या के बाद सोनिया ने लंबे समय तक राजनीति से पूरी तरह दूरी बना रखी थी। उस दौरान पीवी नरसिम्हा राव देश के प्रधानमंत्री बने थे। लेकिन जैसे-जैसे साल 1996 का वक्त आया, कांग्रेस कमजोर पड़ने लगी और पार्टी के भीतर कई तरह के आंतरिक गुट बनने लगे। पार्टी को बिखरने से बचाने और एकजुट करने के लिए आखिरकार साल 1997 में सोनिया गांधी ने कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता ले ली। इसके ठीक 62 दिन बाद साल 1998 में वह आधिकारिक रूप से कांग्रेस पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष चुन ली गईं। सोनिया साल 2017 तक इस पद पर रहीं, जो कांग्रेस पार्टी के पूरे इतिहास में किसी भी अध्यक्ष का सबसे लंबा कार्यकाल है।

साल 2004 में क्यों ठुकराई थी प्रधानमंत्री की कुर्सी?

साल 2004 के आम चुनाव में कांग्रेस ने 14 अलग-अलग क्षेत्रीय सहयोगियों के साथ मिलकर यूपीए (UPA) की नींव रखी थी। चुनाव के बाद लेफ्ट समेत कई अन्य दलों के समर्थन से यूपीए के पास कुल 335 सांसदों का मजबूत समर्थन आ गया था। गठबंधन के सभी साथी नेता चाहते थे कि सोनिया गांधी देश की प्रधानमंत्री बनें, लेकिन 18 मई 2004 को उन्होंने इस पद को लेने से साफ इनकार कर दिया। इसके पीछे की मुख्य वजह यह थी कि एनडीए (NDA) गठबंधन ने सोनिया गांधी के विदेशी मूल (नागरिकता) के मुद्दे को जोरदार तरीके से उठाया और उनके प्रधानमंत्री बनने का कड़ा विरोध किया। इसी राजनीतिक गतिरोध को खत्म करने के लिए सोनिया ने खुद पीएम पद से कदम पीछे खींच लिए और डॉ. मनमोहन सिंह को देश का प्रधानमंत्री बनाने का प्रस्ताव आगे रखा। इसके बाद मनमोहन सिंह देश के प्रधानमंत्री बने। हालांकि राजनीतिक गलियारों में हमेशा यह चर्चा रही कि भले ही कुर्सी पर मनमोहन सिंह बैठे थे, लेकिन पर्दे के पीछे से सरकार की असली बागडोर सोनिया गांधी के ही हाथों में थी।

मनमोहन सिंह के पीएम बनने पर बन चुकी है फिल्म

सोनिया गांधी के पीएम बनने के बजाय डॉ. मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री बनने के इस पूरे राजनीतिक ड्रामे पर उस समय उनके मीडिया सलाहकार रहे संजय बारू ने 'द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर' नाम से एक चर्चित किताब भी लिखी थी, जिसके आधार पर बाद में बड़े पर्दे पर फिल्म भी बनाई जा चुकी है। इसमें सोनिया के पीछे हटने और मनमोहन सिंह के कार्यकाल के दौरान के अंदरूनी हालात का बारीकी से जिक्र किया गया है।