सुप्रीम कोर्ट ने पत्रकारों की पहचान और उनकी सुरक्षा से जुड़े मुद्दे पर सुनवाई करते हुए कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के तहत आज हर व्यक्ति पत्रकार होने का दावा कर सकता है। ऐसे में मान्यता प्राप्त पत्रकारों, स्वतंत्र पत्रकारों और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सक्रिय दूसरे लोगों के बीच अंतर करना तथा वास्तविक पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। गुरुवार, 15 अक्टूबर को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ दिल्ली में 10 और 11 अक्टूबर को हुए प्रदर्शनों के दौरान पत्रकारों के साथ कथित दुर्व्यवहार, मारपीट और हिरासत से जुड़े मामलों पर सुनवाई कर रही थी। अदालत ने महिला पत्रकारों के साथ कथित मारपीट के आरोपों को गंभीर बताया।
महिला पत्रकार के साथ कथित मारपीट का मामला उठा
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने एक महिला पत्रकार के साथ कथित तौर पर पुरुष पुलिसकर्मी द्वारा मारपीट किए जाने का मुद्दा उठाया। उन्होंने आरोपों की जांच के लिए पूर्व महिला न्यायाधीशों और पूर्व भारतीय पुलिस सेवा (IPS) अधिकारियों की समिति गठित करने का सुझाव दिया। पीठ ने मामले को गंभीरता से लेते हुए केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस का पक्ष रख रहे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से संबंधित महिला पत्रकार के खिलाफ फिलहाल कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं करने को कहा। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि मौजूदा सुनवाई याचिका में उल्लेखित पीड़िता के मामले तक सीमित रहेगी।
मोबाइल से वीडियो बनाने वाले और पत्रकार के बीच अंतर पर बहस
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि मौजूदा तकनीकी दौर में मोबाइल फोन रखने वाला कोई भी व्यक्ति खुद को पत्रकार बता सकता है। उन्होंने रील बनाने वाले लोगों और स्वतंत्र पत्रकारों की पहचान के बीच अंतर करने की कठिनाई का मुद्दा भी उठाया। इस पर इंदिरा जयसिंह ने स्वतंत्र पत्रकारों के अधिकारों का पक्ष रखते हुए कहा कि स्वतंत्र रूप से पत्रकारिता करने के अधिकार को भी महत्व दिया जाना चाहिए। सुनवाई के दौरान यह सवाल सामने आया कि प्रदर्शन स्थलों पर रिपोर्टिंग करने वाले अलग-अलग श्रेणियों के लोगों की पहचान कैसे तय की जाए और उनकी सुरक्षा के लिए किस तरह की व्यवस्था हो।
पत्रकारों की सुरक्षा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर जोर
इस मामले में अदालत के सामने दो महत्वपूर्ण पहलू हैं—पत्रकारों को काम के दौरान सुरक्षा देना और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का सम्मान करना। याचिकाकर्ताओं की ओर से प्रदर्शन के दौरान पत्रकारों और अन्य लोगों के साथ कथित दुर्व्यवहार की शिकायतें उठाई गईं। अदालत ने केंद्र से संबंधित याचिकाओं पर जवाब मांगा। सुनवाई में पुलिस द्वारा कथित रूप से जब्त किए गए कैमरा उपकरण लौटाने की मांग का मुद्दा भी सामने आया। हालांकि, आरोपों की जांच और जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया अलग विषय है; सुनवाई के दौरान उठाए गए आरोपों को अदालत का अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जा सकता।
आगे क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट के सामने अब पत्रकारों के साथ कथित दुर्व्यवहार के आरोपों की जांच और उनकी सुरक्षा से जुड़े सवाल हैं। अदालत ने फिलहाल याचिका में बताई गई महिला पत्रकार के मामले पर ध्यान केंद्रित रखने की बात कही है। यह सुनवाई ऐसे समय हो रही है, जब समाचार संस्थानों से जुड़े संवाददाताओं के अलावा फ्रीलांस पत्रकार और सोशल मीडिया पर सक्रिय कंटेंट क्रिएटर भी प्रदर्शन स्थलों पर रिपोर्टिंग करते हैं। ऐसे में पत्रकार की पहचान, काम करने की स्वतंत्रता और सुरक्षा के मानकों को लेकर बहस अहम हो गई है। मामले में आगे की कार्रवाई अदालत के निर्देशों और संबंधित पक्षों के जवाबों पर निर्भर करेगी।