एशियन गेम्स 2026 में भारतीय पुरुष कबड्डी टीम ने ईरान को हराकर स्वर्ण पदक जीता। भारत की इस जीत में कई खिलाड़ियों का योगदान रहा, लेकिन असलम इनामदार की कहानी मेडल से कहीं आगे की है। महाराष्ट्र के छोटे से गांव से निकलकर अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचने वाले असलम ने जिंदगी के बेहद मुश्किल दौर से गुजरते हुए यह मुकाम हासिल किया है। कभी उन्हें दो वक्त का खाना जुटाने के लिए कबाड़ की बोतलें इकट्ठा कर बेचनी पड़ती थीं। कबड्डी टूर्नामेंट खेलने के लिए पैसे नहीं होते थे तो वह बिना टिकट ट्रेन में सफर करते और सीट के नीचे छिपकर रात गुजारते थे। कई बार खाने के लिए सिर्फ वड़ा पाव या टूर्नामेंट में बचा हुआ खाना ही सहारा होता था।

पिता के निधन के बाद परिवार पर टूटा मुश्किलों का पहाड़

असलम महाराष्ट्र के अहिल्यानगर जिले के तकलीभान गांव से आते हैं। जब वह छोटे थे, तभी उनके पिता का निधन हो गया। इसके बाद परिवार की जिम्मेदारी उनकी मां पर आ गई। घर चलाने के लिए उनकी मां दूसरे लोगों के घरों में काम करती थीं और बर्तन साफ करती थीं। परिवार की स्थिति आसान नहीं थी। असलम के बड़े भाई वसीम ने भी परिवार की जिम्मेदारी संभाली और बाद में पुलिस सेवा में चले गए। इसी संघर्ष के बीच असलम ने कबड्डी को अपनी जिंदगी बदलने का जरिया बनाने का फैसला किया।

बोतलें बीनकर खरीदा खाना, वड़ा पाव से मिटाई भूख

किशोरावस्था में असलम के सामने सबसे बड़ी चुनौती खेल नहीं, बल्कि पेट भरना थी। वह सड़क और आसपास से फेंकी गई प्लास्टिक की बोतलें इकट्ठा करते और उन्हें कबाड़ में बेचकर खाने के पैसे जुटाते थे। कबड्डी प्रतियोगिताओं में जाने के दौरान भी आर्थिक स्थिति उनका पीछा नहीं छोड़ती थी। कई बार उनके पास खाने तक के पैसे नहीं होते थे। ऐसे समय में वड़ा पाव, रोटी या प्रतियोगिता में खिलाड़ियों के लिए मिला खाना ही उनका सहारा बनता था। कभी-कभी वह बचा हुआ खाना बैग में रखकर बाद में खाते थे। हालात इतने कठिन थे कि वह इस बात की भी परवाह नहीं कर पाते थे कि खाना खराब हो चुका है या नहीं।

बिना टिकट ट्रेन में सफर, सीट के नीचे काटी रातें

कबड्डी खेलने का जुनून असलम को महाराष्ट्र के अलग-अलग हिस्सों में होने वाली स्थानीय प्रतियोगिताओं तक ले गया। लेकिन यात्रा के लिए पैसे नहीं होते थे। करीब 14-15 साल की उम्र में वह अकेले टूर्नामेंट खेलने जाने लगे। कई बार बिना टिकट ट्रेन में सफर किया और रात ट्रेन की सीट के नीचे सोकर गुजारी। स्थानीय मुकाबलों में उन्हें एक मैच के 200 से 500 रुपये तक मिल जाते थे। कई प्रतियोगिताओं में पैसे की जगह सिर्फ खाना मिलता था, लेकिन असलम के लिए वह भी बहुत बड़ी मदद थी।

चाय की दुकान से प्रो कबड्डी तक का सफर

कबड्डी के साथ-साथ असलम ने जीवन चलाने के लिए कई छोटे-मोटे काम भी किए। उन्होंने चाय की दुकानों और जूस सेंटरों पर बर्तन धोए। शौचालय साफ किए और खेतों में भी मजदूरी की। इसी दौरान कबड्डी उनके लिए सिर्फ खेल नहीं रहा, बल्कि आगे बढ़ने की उम्मीद बन गया। धीरे-धीरे उनके खेल पर लोगों की नजर पड़ी और उन्हें बड़े स्तर पर खेलने के मौके मिलने लगे। उनके करियर में बड़ा मोड़ प्रो कबड्डी लीग से आया। वर्ष 2020 में उन्हें अपने पहले सीजन में 8 लाख रुपये मिले। असलम के लिए यह रकम किसी बहुत बड़ी दौलत से कम नहीं थी। उन्होंने इसी कमाई से अपनी मां के लिए सोने का हार खरीदा था।

अब गले में दो एशियन गेम्स के गोल्ड मेडल

असलम की मेहनत का नतीजा अब दुनिया के सामने है। एशियन गेम्स 2026 के फाइनल में भारत ने ईरान को 40-34 से हराकर पुरुष कबड्डी का स्वर्ण पदक जीता। इस जीत के साथ भारत ने अपना खिताब बरकरार रखा और कबड्डी में नौवां पुरुष एशियन गेम्स गोल्ड हासिल किया।असलम इस टीम का अहम हिस्सा रहे। वह 2022 के एशियन गेम्स में भी स्वर्ण जीतने वाली भारतीय टीम में शामिल थे। यानी अब उनके पास एशियन गेम्स के दो स्वर्ण पदक हैं। फाइनल के आखिरी दौर में भी असलम ने अहम अंक जुटाए और भारत की बढ़त बनाए रखने में योगदान दिया। जिस खिलाड़ी के पास कभी खाने तक के पैसे नहीं थे, उसी के गले में आज दो अंतरराष्ट्रीय स्वर्ण पदक हैं।

"आज भी यह सपना जैसा लगता है"

अपनी जिंदगी के इस बदलाव को असलम खुद भी आसानी से यकीन नहीं कर पाते। उन्होंने बताया कि वह अक्सर सोचते हैं कि जिस समय उनके घर में खाने तक की कमी थी, आज उनके पास दो अंतरराष्ट्रीय पदक हैं। उनकी कहानी बताती है कि खेल की दुनिया में सफलता सिर्फ प्रतिभा से नहीं आती। उसके पीछे कई बार ऐसे संघर्ष छिपे होते हैं, जिनकी कल्पना मैदान पर दिखाई देने वाले कुछ मिनटों से नहीं की जा सकती। तकलीभान गांव से शुरू हुआ असलम का सफर अब एशियन गेम्स के स्वर्ण पदक तक पहुंच चुका है। उनकी कहानी संघर्ष, भूख, मेहनत और खेल के जरिए बदली जिंदगी की मिसाल बन गई है।