Harmful effect of Crackers Smoke : दीपावली की रात भव्य आतिशबाजी के बाद अगली सुबह नींद खुलती है तो आसमान काफी हद तक साफ नजर आता है। सड़कों से भी कचरा हटा दिया जाता है। इसे देखकर आम तौर पर यही लगता है कि अब प्रदूषण छंट चुका है। हवा शुद्ध हो गई है। क्या सच में ऐसा है? आपका भी यही सोचना है तो यह आपकी बड़ी भूल हो सकती है। आसमान से धुएं का गायब होना इस बात की गारंटी नहीं है कि प्रदूषण भी पूरी तरह खत्म हो चुका है। असली चिंता और गंभीर स्थिति तो असल में इसके बाद शुरू होती है। आतिशबाजी के दौरान निकलने वाले जहरीले रसायन और बारीक कण सिर्फ हवा तक सीमित नहीं रहते, बल्कि वे धीरे-धीरे जमीन, मिट्टी और पानी के रास्तों से होते हुए हमारे पूरे पर्यावरण को अंदर ही अंदर जकड़ लेते हैं। विस्तार से जानते हैं कि पटाखों का यह अदृश्य प्रदूषण किस तरह हमारे जीवन और प्रकृति को नुकसान पहुंचाता है।
हवा में छंटने के बाद भी बने रहते हैं खतरनाक सूक्ष्म कण
पटाखे फूटने के बाद आसमान का धुआं भले ही छंट जाए, लेकिन उसके साथ निकले सभी हानिकारक प्रदूषक आंखों से ओझल जरूर हो जाते हैं, पर पूरी तरह समाप्त नहीं होते। इनमें PM2.5 और PM10 जैसे अत्यंत सूक्ष्म कण प्रमुख हैं। PM2.5 कण इतने बारीक होते हैं कि सांस के जरिए हमारे फेफड़ों के अंदरूनी और सबसे संवेदनशील हिस्सों तक आसानी से पहुंच जाते हैं। PM10 कण आकार में इनसे थोड़े बड़े होते हैं, लेकिन ये भी हमारे श्वसन तंत्र को बुरी तरह प्रभावित करते हैं। इसके अलावा सल्फर डाइऑक्साइड जैसी जहरीली गैसें और धातुओं के सूक्ष्म कण वातावरण की हवा को लंबे समय तक दूषित बनाए रखते हैं। यही वजह है कि सिर्फ सुबह आसमान साफ दिखने पर राहत की सांस लेना जल्दबाजी हो सकती है। असल स्थिति जानने के लिए हमेशा एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) और वास्तविक प्रदूषण के स्तर की जांच करनी चाहिए।
पटाखों की राख से मिट्टी और जमीन पर क्या असर पड़ता है?
दिवाली के अगले दिन पार्कों, गलियों और घरों के बाहर बिखरी राख और कचरे को हम अमूमन साधारण कचरा मानकर साफ कर देते हैं। लेकिन पटाखों के इन जले हुए अवशेषों में सिर्फ कागज और बारूद नहीं होता। विभिन्न रंगों और प्रभावों वाले पटाखों में बेरियम, स्ट्रॉन्शियम, कॉपर, एल्युमिनियम, पोटैशियम और एंटीमनी जैसे भारी धातु तत्व इस्तेमाल किए जाते हैं। आतिशबाजी के बाद इनका एक हिस्सा हवा में घुलता है और बाकी हिस्सा राख बनकर जमीन पर बैठ जाता है। सफाई के बाद भी इन रसायनों के सूक्ष्म कण मिट्टी की ऊपरी परत में समा जाते हैं।
मिट्टी की सेहत और सूक्ष्म जीवों पर मंडराता खतरा
हम अमूमन हवा और पानी के प्रदूषण की बात तो करते हैं, लेकिन मिट्टी के भीतर होने वाले नुकसान अक्सर नजर नहीं आते। मिट्टी में मौजूद सूक्ष्म जीव और बैक्टीरिया उसकी प्राकृतिक उर्वरता को बनाए रखने का काम करते हैं। पटाखों से निकले मेटल पार्टिकल्स जब भारी मात्रा में मिट्टी में जमा होने लगते हैं तो इससे इन लाभकारी सूक्ष्म जीवों की गतिविधियां प्रभावित होती हैं, जिसका सीधा असर पौधों की ग्रोथ और सेहत पर पड़ता है। कुछ पटाखों में ऑक्सीडाइजर के रूप में इस्तेमाल होने वाला परक्लोरेट नामक रसायन भी बड़ी चिंता का विषय है। यह पानी में आसानी से घुल जाता है और मिट्टी से रिसकर दूर-दूर तक फैल जाता है। केरल में आतिशबाजी के बाद मिट्टी और पानी के नमूनों पर किए गए एक अध्ययन में यह बात सामने आई थी कि वहां परक्लोरेट की मात्रा आतिशबाजी के तीसरे दिन सबसे ज्यादा दर्ज की गई थी। इससे साफ है कि पटाखों का असर कई दिनों तक पर्यावरण में बना रहता है।
पानी और जलस्रोतों तक कैसे पहुंचता है पटाखों का जहर?
यह बात आपको हैरान कर सकती है कि पटाखों का कचरा सीधे तौर पर हमारे जलस्रोतों को भी गंदा कर सकता है। त्योहार के अगले दिन जब घरों और सड़कों की धुलाई होती है तो पानी के साथ पटाखों की राख नालियों में चली जाती है। बारिश होने पर भी जमीन पर फैला यह कचरा बहकर तालाबों, नालों और नदियों तक पहुंच जाता है। कॉपर, जिंक, लेड और एंटीमनी जैसे जहरीले तत्व पानी में घुलकर जलीय स्रोतों को दूषित करते हैं। 2025 में न्यूयॉर्क में हुए एक अध्ययन में यह बात सामने आई थी कि जुलाई की आतिशबाजी के बाद जब ईस्ट रिवर के पानी की जांच की गई तो उसमें जिंक, लेड, एंटीमनी और कॉपर की मात्रा सामान्य से दोगुनी से अधिक पाई गई। वैसे, हर जगह का भूगोल और असर अलग हो सकता है, लेकिन यह उदाहरण साबित करता है कि आतिशबाजी का दायरा सिर्फ आसमान तक सीमित नहीं है।
जलीय जीवों और फूड चेन के लिए बढ़ती मुश्किलें
पटाखों के रासायनिक अवशेष नदी, झील या तालाब में मिल जाएं तो मछलियों और अन्य जलीय जीवों पर गंभीर दुष्प्रभाव पड़ सकता है। इन धातुओं की अधिक मात्रा जलीय जीवों के विकास, प्रजनन और सामान्य बायोलॉजिकल एक्टिविटीज में बाधा बनती है। सबसे खतरनाक बात है कि ये प्रदूषक धीरे-धीरे जलीय जीवों के शरीर में जमा होने लगते हैं और फिर फूड चेन के जरिए इंसानों और अन्य वन्यजीवों तक भी पहुंच सकते हैं। साफ दिखने वाला पानी भी रासायनिक रूप से दूषित हो सकता है, जिसका पता बिना लैब टेस्ट के लगाना मुश्किल है।
क्या बारिश इस प्रदूषण को पूरी तरह साफ कर देती है?
आम धारणा है कि बारिश होने से हवा का प्रदूषण धुल जाता है। यह बात आंशिक रूप से सही है कि बारिश हवा में तैर रहे कुछ धूल-कणों को नीचे जरूर खींच लेती है, जिससे हवा थोड़ी साफ महसूस होती है। लेकिन सवाल यह है कि जो प्रदूषक कण हवा से नीचे आए, वे आखिर गए कहां? वे या तो जमीन की मिट्टी में बैठ जाते या फिर बारिश के बहते पानी के साथ नालियों और जलस्रोतों तक पहुंच जाते हैं। यानी प्रदूषण असल में खत्म नहीं होता, बल्कि वह हवा से शिफ्ट होकर जमीन और पानी में ट्रांसफर हो जाता है। इस चलते बारिश को पटाखों के प्रदूषण का पक्का समाधान नहीं माना जा सकता।
कितने दिनों तक बना रहता है पटाखों का प्रदूषण?
इस सवाल का कोई तयशुदा जवाब नहीं है, क्योंकि हर प्रदूषक और रसायन का व्यवहार अलग होता है। कुछ हल्के कण कुछ घंटों या दिनों में हवा से हट जाते हैं, जबकि कुछ महीन कण मौसम की स्थिति के अनुसार लंबे समय तक वातावरण में टिके रह सकते हैं। 2016 में प्रकाशित एक वैज्ञानिक समीक्षा के अनुसार कुछ विशेष वातावरणीय परिस्थितियों में आतिशबाजी से निकले सूक्ष्म कण एक महीने तक हवा में निलंबित रह सकते हैं। मिट्टी और पानी में घुले रासायनिक तत्वों के नष्ट होने की अवधि भी उनकी मात्रा और प्रकृति पर निर्भर करती है।
पटाखे जलाने के बाद इन बातों का रखें ख्याल
पर्यावरण और अपनी सेहत को सुरक्षित रखने के लिए सिर्फ दिवाली के अगले दिन सड़क पर झाड़ू लगा देना काफी नहीं है, बल्कि इन बातों का भी ध्यान रखना बेहद जरूरी है:-
- पटाखों की राख और जले अवशेषों को इधर-उधर या खुले में न छोड़ें।
- पटाखों का सारा कचरा नालियों, सीवर या किसी जलस्रोत में न बहाएं।
- राख और कचरे को इकट्ठा करें और स्थानीय नगर निगम या कचरा निपटान व्यवस्था के नियमों के अनुसार उसका निस्तारण करें।
- कृषि भूमि, खेतों और किसी जलस्रोत के आसपास आतिशबाजी करने से बचें।
- छोटे बच्चों और पालतू जानवरों को पटाखों के इन जहरीले अवशेषों से दूर रखें।