दुनिया के कई देशों में युवा पीढ़ी सड़कों पर उतरकर सरकारों और राजनीतिक व्यवस्था से सवाल कर रही है। कहीं भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद के खिलाफ प्रदर्शन हो रहे हैं, तो कहीं बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा और अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर गुस्सा दिखाई दे रहा है। नेपाल, बांग्लादेश, केन्या, इंडोनेशिया, मोरक्को और भारत जैसे देशों में युवाओं के आंदोलनों की वजहें अलग-अलग हैं, लेकिन उनकी मांगों में कई समानताएं हैं। इन आंदोलनों में सोशल मीडिया की भूमिका भी अहम रही है। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर शुरू होने वाले Gen Z के आंदोलन कई देशों में बड़े सड़क प्रदर्शनों का रूप ले रहे हैं। अलग-अलग राजनीतिक और आर्थिक हालात के बावजूद युवाओं में बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार, असमानता और सरकारों के प्रति असंतोष जैसे मुद्दे साझा हैं। सवाल यह है कि इन समान समस्याओं ने दुनिया भर के युवाओं के गुस्से को एक जैसी आवाज कैसे दे दी?
कौन हैं Gen Z?
Gen Z यानी जनरेशन जेड उन लोगों की पीढ़ी को कहा जाता है, जिनका जन्म आम तौर पर 1997 से 2012 के बीच हुआ। यह वह पीढ़ी है, जिसने इंटरनेट, स्मार्टफोन और सोशल मीडिया के बीच बचपन से ही दुनिया को देखा है। डिजिटल माध्यमों से जुड़ाव के कारण इस पीढ़ी के युवा सूचनाएं तेजी से साझा कर सकते हैं, सरकारों और संस्थानों के फैसलों पर सवाल उठा सकते हैं और अपने मुद्दों पर लोगों को एकजुट कर सकते हैं। सभी युवा एक जैसी सोच नहीं रखते और हर देश में आंदोलनों का स्वरूप भी अलग होता है।
Gen Z के आंदोलनों के पीछे क्या हैं प्रमुख वजहें?
दुनिया के अलग-अलग देशों में हुए युवा आंदोलनों में कुछ मुद्दे बार-बार सामने आए हैं।
- भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद: युवाओं में यह नाराजगी दिखाई देती है कि राजनीतिक और आर्थिक रूप से प्रभावशाली लोगों को विशेष सुविधाएं मिलती हैं, जबकि आम लोगों को अवसरों के लिए संघर्ष करना पड़ता है।
- बेरोजगारी और आर्थिक दबाव: रोजगार की कमी, महंगाई और बढ़ती आर्थिक असमानता युवाओं की चिंताओं में शामिल हैं।
- शिक्षा और सार्वजनिक सेवाएं: बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और सरकारी व्यवस्था में पारदर्शिता की मांग कई आंदोलनों का हिस्सा रही है।
- अभिव्यक्ति की आजादी: सोशल मीडिया पर प्रतिबंध, सरकारी सख्ती और विरोध की आवाज को सीमित किए जाने की आशंका ने भी कई जगह प्रदर्शन को हवा दी है।
- राजनीतिक जवाबदेही: युवा चाहते हैं कि सरकारें फैसलों के पीछे की वजह बताएं और जनता की शिकायतों पर कार्रवाई करें।
बांग्लादेश: आरक्षण के विरोध से शुरू हुआ आंदोलन
जुलाई 2024 में बांग्लादेश में सरकारी नौकरियों में आरक्षण व्यवस्था के खिलाफ छात्रों ने प्रदर्शन शुरू किया। आंदोलन के दौरान रोजगार में समान अवसर, भ्रष्टाचार और सरकार की कार्यप्रणाली जैसे मुद्दे भी उठने लगे। प्रदर्शनों पर सरकारी कार्रवाई के बाद स्थिति और बिगड़ी। अगस्त 2024 में तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना ने पद छोड़ दिया और देश से बाहर चली गईं। बांग्लादेश का आंदोलन इस बात का उदाहरण बना कि छात्रों की मांगें व्यापक जनसमर्थन मिलने पर बड़े राजनीतिक बदलाव का रूप ले सकती हैं।
केन्या: टैक्स बढ़ाने के प्रस्ताव पर सड़कों पर उतरे युवा
जून 2024 में केन्या में सरकार के प्रस्तावित वित्त विधेयक के खिलाफ व्यापक विरोध हुआ। युवाओं ने आशंका जताई कि नए करों से आम लोगों पर आर्थिक बोझ बढ़ेगा। सोशल मीडिया के जरिए प्रदर्शन की जानकारी फैलने के बाद बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर आए। विरोध के बीच संसद परिसर में भी हिंसा हुई। बढ़ते जनदबाव के बाद राष्ट्रपति विलियम रूटो ने विधेयक वापस लेने का ऐलान किया। इस आंदोलन में करों के अलावा सरकारी खर्च, भ्रष्टाचार और जवाबदेही के मुद्दे भी प्रमुख रहे।
नेपाल: सोशल मीडिया प्रतिबंध और भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन
सितंबर 2025 में नेपाल में युवाओं के नेतृत्व वाले प्रदर्शनों ने व्यापक रूप ले लिया। सरकार के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रतिबंध लगाने के फैसले ने अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर नाराजगी बढ़ाई। इसके साथ ही भ्रष्टाचार, राजनीतिक परिवारों को मिलने वाले कथित विशेषाधिकार और अवसरों की असमानता भी विरोध के मुद्दे बने। प्रदर्शन हिंसक हो गए और कई लोगों की जान गई। बढ़ते दबाव के बीच तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने इस्तीफा दे दिया। नेपाल का आंदोलन क्षेत्र के अन्य देशों में युवाओं के बीच भी चर्चा का विषय बना।
इंडोनेशिया: सांसदों की सुविधाओं और महंगाई पर नाराजगी
इंडोनेशिया में अगस्त 2025 में सांसदों को मिलने वाली सुविधाओं और भत्तों के खिलाफ प्रदर्शन हुए। युवाओं ने सवाल उठाया कि जब आम लोग महंगाई, बेरोजगारी और आर्थिक मुश्किलों का सामना कर रहे हैं, तब जनप्रतिनिधियों को अतिरिक्त सुविधाएं क्यों दी जा रही हैं। प्रदर्शन व्यापक होने पर सरकार ने कुछ फैसलों में बदलाव किए। इस आंदोलन ने राजनीतिक विशेषाधिकारों और जनता की आर्थिक स्थिति के बीच अंतर को लेकर असंतोष उजागर किया।
मोरक्को: बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की मांग
मोरक्को में 2025 में युवाओं के नेतृत्व वाले प्रदर्शनों में स्वास्थ्य और शिक्षा व्यवस्था की स्थिति, बेरोजगारी और असमानता जैसे मुद्दे उठे। प्रदर्शनकारियों ने सार्वजनिक सेवाओं में सुधार और युवाओं के लिए बेहतर अवसरों की मांग की। यहां आंदोलन ने इस सवाल को सामने रखा कि सरकार की प्राथमिकताओं में आम नागरिकों की बुनियादी जरूरतों को कितना महत्व दिया जा रहा है।
भारत: शिक्षा और व्यवस्था में जवाबदेही की मांग
भारत में भी युवाओं के नेतृत्व वाले प्रदर्शनों में शिक्षा व्यवस्था, परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं और संस्थागत जवाबदेही जैसे मुद्दे उठे हैं। दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्रों के प्रदर्शनों में परीक्षा प्रक्रिया में पारदर्शिता और कथित गड़बड़ियों की निष्पक्ष जांच की मांग सामने आई। भारत की परिस्थितियां दूसरे देशों से अलग हैं और यहां के सभी युवा आंदोलन एक ही मुद्दे या संगठन से जुड़े नहीं हैं। फिर भी शिक्षा, रोजगार और सरकारी संस्थानों पर भरोसे से जुड़े सवाल युवाओं की सार्वजनिक चर्चाओं में महत्वपूर्ण बने हुए हैं।
सोशल मीडिया ने आंदोलनों का तरीका कैसे बदला?
Gen Z के आंदोलनों की एक खास बात यह है कि सोशल मीडिया केवल सूचना साझा करने का माध्यम नहीं रहा, बल्कि लोगों को जोड़ने, प्रदर्शन की योजना बनाने और घटनाओं के वीडियो प्रसारित करने का जरिया भी बना है। TikTok, Instagram और X जैसे प्लेटफॉर्म पर स्थानीय मुद्दे तेजी से दूसरे देशों तक पहुंच सकते हैं। एक देश में हुए प्रदर्शन की तस्वीरें और तरीके दूसरे देशों के युवाओं को प्रेरित कर सकते हैं। डिजिटल अभियान अपने आप किसी आंदोलन को सफल नहीं बनाते। लोगों की जमीनी भागीदारी, स्थानीय परिस्थितियां और सरकार की प्रतिक्रिया भी उसकी दिशा तय करती हैं।
अलग देश, लेकिन युवाओं के सवाल मिलते-जुलते
नेपाल में सोशल मीडिया पर प्रतिबंध और भ्रष्टाचार, केन्या में टैक्स बढ़ोतरी, बांग्लादेश में रोजगार में आरक्षण, इंडोनेशिया में सांसदों की सुविधाएं और भारत में शिक्षा से जुड़े मुद्दे Gen Z के विरोध प्रदर्शनों की प्रमुख वजह बने। मुद्दे भले ही अलग-अलग हों, लेकिन इनके पीछे शासन व्यवस्था से असंतोष, जवाबदेही की मांग और बेहतर भविष्य की उम्मीद जैसी समान चिंताएं दिखाई देती हैं। फिर भी इन आंदोलनों में पारदर्शिता, समान अवसर, आर्थिक सुरक्षा और जवाबदेही की मांग साझा रूप से दिखाई देती है। इन प्रदर्शनों के नतीजे भी हर देश में एक जैसे नहीं रहे। कई देशों में Gen Z के विरोध प्रदर्शनों के बाद सरकारों को अपने फैसले बदलने पड़े, कहीं सत्ता और राजनीतिक नेतृत्व में बदलाव आया, तो कहीं युवाओं की मांगों पर अब भी चर्चा जारी है। यह दिखाता है कि ये आंदोलन किसी एक वैश्विक संगठन के तहत नहीं चल रहे, बल्कि अलग-अलग देशों में व्यवस्था से असंतोष और बदलाव की चाह को सामने ला रहे हैं।