(By- Bhumika Chauhan) सुप्रीम कोर्ट ने 1 सितम्बर को जंतर-मंतर में हुए प्रोटेस्ट पर अपना फैसला सुनाया है और छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज सभी FIR खारिज कर दी हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 142 के तहत ये फैसला सुनाया और पुलिस द्वारा पाए 2873 संग्दिध आरोपियों पर कार्रवाई करने की अनुमति दे दी है। नीट पेपर लिक के कारण जिन बच्चों ने आत्महत्या की थी उन पीड़ित परिवारों को मुआवजा देने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को आदेश दिया है। 3 महीने के अंदर इससे संबंधित नीति बनाई जाएंगी। 

फेशियल रिकग्निशन सिस्टम पर उठे सवाल

20 जुलाई से 25 जुलाई के बीच में हुए जंतर-मंतर प्रोटेस्ट में दिल्ली पुलिस ने 2873 संदिग्धों को पहचान की थी। दिल्ली पुलिस के मुताबित, 2873 प्रदर्शनकारियों के खिलाफ आपराधिक रिकॉर्ड पाया गया है। हैरान करने वाली बात ये है कि ये आरोपी जेल के अंदर बंद हैं, ऐसे में ये प्रोटेस्ट में कैसे देखे गए? प्रोटेस्ट में इनकी पहचान कैसे हुई?

कैसे पहचान करता है फेशियल रिकग्निशन सिस्टम?

एक फेशियल रिकग्निशन सॉफ्टवेयर होता है जो फेशियल फीचर्स की पहचान करता है और उन्हें कन्वर्ट कर मैथमैटिकल तरीके से दर्शाता है। इसे फेशियल टेम्पलेट भी कहा जाता है। इसके बाद इन तस्वीरों की पुलिस के पास मौजुद डाटाबेस से तुलना की जाती है। अगर दोनों तस्वीरों में तय सीमा तक समानता दिखाई देती है, तो सॉफ्टवेयर पॉसिबल मैच बनाता है। ये मैच कई बार गलत भी हो सकता है।  

पुलिस का क्या है जवाब?

दिल्ली पुलिस ने 17 अगस्त को कोर्ट में हलफनामा दर्ज किया था। दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर प्रोटेस्ट में फेशियल रिकग्निशन सिस्टम के जरिए संदिग्ध अपरधियों की पहचान की थी, जिसके हिसाब से 2,873 लोगों के आपराधिक रिकॉर्ड पाए गए। हालांकि, इस मामले में उनकी व्रिफकशन होना अभी बाकी है। ऐसा माना जा रहा है कि बायोमेट्रिक डेटाबेस 'क्राइम कुंडली' से 2,402 लोगों की पहचान की गई और 471 लोगों की पहचान क्रिमिनल रिकॉर्ड के जरिए हुई।