Sonia Gandhi Book News : कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष और देश की दिग्गज राजनेता सोनिया गांधी की हाल में आई किताब बिलॉन्गिंग: ए जर्नी ऑफ लव (Belonging: A Journey of Love) राजनीतिक गलियारों और मीडिया में चर्चा का केंद्र बनी है। इस आत्मकथात्मक पुस्तक में उन्होंने देश के राजनीतिक इतिहास के सबसे संवेदनशील दौर यानी आपातकाल (Emergency 1975-1977) के काले पन्नों का भी खुलकर जिक्र किया है। सोनिया गांधी ने अपनी किताब और एक प्रतिष्ठित मीडिया संस्थान द हिंदू को दिए लिखित इंटरव्यू में साझा किया है कि उस दौर में उन्होंने खुद क्या-क्या देखा था और उनके मन में क्या भावनाएं थीं।

आपातकाल के दौरान बिगड़ते हालात और इंदिरा गांधी का संघर्ष

सोनिया गांधी ने अपनी किताब में लिखा है कि उस दौर में पूर्व प्रधानमंत्री और उनकी सास इंदिरा गांधी देश के लगातार बिगड़ते हुए राजनीतिक और सामाजिक हालात से निपटने के लिए कड़ा संघर्ष कर रही थीं। उस समय में चीजें बेहद जटिल थीं। उन्होंने बताया कि जब आपातकाल का दौर चल रहा था, तब उन्हें इसकी पूरी गंभीरता और असलियत का अंदाजा नहीं था। सोनिया के मुताबिक आपातकाल हटने और उसके समाप्त होने के बाद उन्हें वास्तव में यह अहसास हुआ कि उस कालखंड में जमीनी स्तर पर क्या कुछ घटित हुआ था और उसकी विभीषिका कितनी गंभीर थी। सोनिया गांधी ने स्वीकार किया है कि उस दौर में नागरिकों के कई लोकतांत्रिक अधिकारों को सीमित कर दिया गया था और संविधान प्रदत्त हेबियस कॉर्पस जैसे मौलिक अधिकार को भी निलंबित कर दिया गया था। उन्होंने यह भी जोड़ा कि यह सब कुछ उस समय संवैधानिक कानूनी तरीकों के दायरे में किया गया था। जब वह उस दौर में पीछे मुड़कर देखती हैं और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नजरिए से पूरे घटनाक्रम का विश्लेषण करती हैं, तो उन्हें इंदिरा गांधी देश में तेजी से बेकाबू होते हालात से जूझती हुई नजर आती हैं।

हिंसक विरोध-प्रदर्शन, आगजनी और नौकरशाही पर बगावत के सुर

सोनिया गांधी ने अपनी किताब में उस समय के माहौल का जिक्र करते हुए बताया कि उन दिनों देशभर में चल रहे विरोध-प्रदर्शन बेहद हिंसक रूप ले चुके थे। सरकारी कार्यालयों और सार्वजनिक परिवहन साधनों को निशाना बनाकर बड़े पैमाने पर आगजनी की जा रही थी। समाज के हर कोने में एक सुनियोजित असंतोष फैला हुआ था, जो सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन गया था। हालात इतने तनावपूर्ण थे कि देश की प्रशासनिक नौकरशाही और यहां तक कि सशस्त्र बलों से भी सरकार के आदेशों की अवहेलना करने और बगावत करने का खुलेआम आह्वान किया जा रहा था।

'अब हम उन परिस्थितियों को ज्यादा बेहतर ढंग से समझ सकते'

सोनिया गांधी का मानना है कि आज इतने साल बीतने के बाद पीछे मुड़कर देखने पर हम उन परिस्थितियों को ज्यादा बेहतर और तार्किक ढंग से समझ सकते हैं। मगर, हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि यह इंदिरा गांधी ही थीं, जिन्होंने खुद देश के हालातों की नजाकत को समझा और अंततः मार्च 1977 में देश में आम चुनाव कराने का ऐतिहासिक फैसला लिया। इतिहास इस बात का गवाह है कि बाद में खुद इंदिरा गांधी ने सार्वजनिक मंचों से इस बात पर गहरा अफसोस जताया था और आपातकाल के दौरान हुई ज्यादतियों व प्रशासनिक गलतियों के लिए देश की जनता से खुले दिल से माफी भी मांगी थी।

राजनीतिक हलकों में क्यों अहम है सोनिया गांधी का यह बयान?

भारतीय राजनीति और विशेष तौर पर कांग्रेस पार्टी के इतिहास में आपातकाल हमेशा से सबसे संवेदनशील और बहस का विषय रहा है। विपक्षी दल अक्सर इस दौर को लेकर कांग्रेस पार्टी को घेरते रहे हैं। ऐसे में सोनिया गांधी द्वारा अपनी किताब में इस दौर का जिक्र करना और इंदिरा गांधी की उस समय की मजबूरियों व संघर्षों को सामने रखना बेहद सामयिक और राजनीतिक रूप से बड़ा कदम माना जा रहा है।