मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ इंडियन एक्सप्रेस द्वारा बड़ा खुलासा सामने आया था। जिसमें पता चला था कि एसआईआर अभियान के दौरान चुनाव आयुक्तों को कई फैसलों की जानकारी से वांछित रखा गया और दोनों चुनाव आयुक्तों, सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों तक इन फैसलों पर बार-बार अपनी आपत्ति भी जाहिर की थी।
ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मतदाता सूची में गड़बड़ी का आरोप है, प्रदर्शनकारियों और CJP का दावा है कि चुनाव आयोग द्वारा वोटर लिस्ट के पुनरीक्षण के दौरान कई वैध मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं, जिससे लाखों लोग मताधिकार से वंचित हो गए। इसी कारण सीजीपी ने आज जंतर-मंतर पर प्रोटेस्ट का ऐलान किया था।
पुलिस हिरासत का क्या मतलब है?
कानूनी रूप से, हिरासत का अर्थ किसी व्यक्ति की आवाजाही पर अस्थायी रूप से रोक लगाना है। पुलिस सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए संभावित घटना या अपराध को रोकने के लिए ऐसा कदम उठाती है। विशेष तौर पर विरोध प्रदर्शनों या रैलियों के दौरान, यदि कोई भीड़ देश की सुरक्षा के लिए खतरा बनती है या निषेधाज्ञा (prohibitory orders) का उल्लंघन करती है, तो पुलिस हस्तक्षेप कर सकती है। हालांकि, कानूनी जानकारों का कहना है कि सिर्फ पूछताछ या एहतियात के नाम पर पुलिस को किसी को भी अनिश्चितकाल तक रोकने का असीमित अधिकार नहीं है।
गिरफ्तारी की क्या है प्रक्रिया और नियम
दूसरी ओर, गिरफ्तारी एक औपचारिक कानूनी कार्रवाई है, जो किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता को पूरी तरह से कानूनी नियंत्रण में ले लेती है। हर मामले में अदालत के वारंट की जरूरत नहीं होती। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत, कुछ खास परिस्थितियों और संज्ञेय अपराधों में पुलिस बिना वारंट के भी गिरफ्तार कर सकती है। हालांकि, सिर्फ किसी पर आरोप लगने से गिरफ्तारी नहीं हो जाती। पुलिस को यह भी देखना होता है कि क्या गिरफ्तारी वास्तव में जरूरी है, और ये निश्चित करना कि आगे ऐसे अपराध ना हो, सबूतों से छेड़छाड़ रोकना और आरोपी को अदालत के सामने पेश करना।
हिरासत और गिरफ्तारी में मुख्य अंतर
हिरासत अस्थायी होती है और इसका उद्देश्य आमतौर पर पूछताछ या एहतियात बरतना होता है। इसमें औपचारिक आरोप नहीं लगाए जाते।
गिरफ्तारी एक सख्त कानूनी प्रक्रिया है, जो तयशुदा वैधानिक नियमों और अधिकारों से बंधी होती है। पुलिस किसी की स्वतंत्रता को प्रतिबंधित करके उसे केवल "हिरासत" का नाम देकर कानूनी सुरक्षा उपायों से बच नहीं सकती। कार्रवाई का असल स्वरूप मायने रखता है, न कि पुलिस द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द।
नागरिकों के कानूनी अधिकार
संविधान का अनुच्छेद 22 और देश के कानून नागरिकों को कुछ बुनियादी अधिकार देते हैं:
- कारण जानने का अधिकार: हिरासत या गिरफ्तारी के कारणों के बारे में व्यक्ति को तुरंत सूचित किया जाना चाहिए।
- वकील से सलाह: गिरफ्तार व्यक्ति को अपनी पसंद के कानूनी सलाहकार या वकील से परामर्श करने का अधिकार है।
- 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेशी: यात्रा के समय को छोड़कर, गिरफ्तार व्यक्ति को आमतौर पर 24 घंटे के भीतर नजदीकी मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना अनिवार्य है। इसके बाद की हिरासत के लिए मजिस्ट्रेट की अनुमति जरूरी होती है।
- डी.के. बासू दिशानिर्देश: सुप्रीम कोर्ट के इन दिशा-निर्देशों के तहत पुलिस के लिए यह अनिवार्य है कि वे अपनी पहचान स्पष्ट रखें, गिरफ्तारी के समय 'अरेस्ट मेमो' तैयार करें, परिवार के किसी सदस्य को तुरंत सूचना दें और मेडिकल जांच सुनिश्चित करें।
क्या बिना कानूनी आधार के हो सकती है कार्रवाई?
पुलिस का कर्तव्य कानून-व्यवस्था बनाए रखना है, लेकिन शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों को देश के कानून और संविधान के तहत सुरक्षा प्राप्त है। किसी भी प्रकार के प्रतिबंध या हिरासत का एक वैध कानूनी आधार होना चाहिए। यदि किसी नागरिक को लगता है कि उनके अधिकारों का उल्लंघन हुआ है, तो वे कानूनी मदद ले सकते हैं और उचित न्यायिक मंच का दरवाजा खटखटा सकते हैं।