मैथ्यू एरॉन वैनडाइक को लेकर इस समय सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की है कि आखिर उसकी तुलना मसूद अजहर से क्यों की जा रही है। अमेरिकी नागरिक वैनडाइक को मार्च 2026 में एनआईए ने छह यूक्रेनी नागरिकों के साथ गिरफ्तार किया था। एजेंसी ने आरोप लगाया था कि यह समूह म्यांमार के जातीय सशस्त्र समूहों से जुड़े लोगों को ड्रोन युद्ध और अन्य सैन्य तकनीकों की ट्रेनिंग देने की कथित योजना में शामिल था। मामला शुरुआत में यूएपीए के तहत दर्ज हुआ था। लेकिन 8 सितंबर को दाखिल पहली चार्जशीट में यूएपीए की धाराएं नहीं लगाई गईं और बाद में अदालत ने वैनडाइक को डिफॉल्ट बेल दे दी। इसके बाद 24 सितंबर को अदालत ने उसे एक महीने के लिए अमेरिका जाने की अनुमति भी दे दी। इसी घटनाक्रम को लेकर कांग्रेस के कुछ नेताओं और सोशल मीडिया यूजर्स ने इसे 1999 में मसूद अजहर की रिहाई से जोड़ना शुरू किया।

कांग्रेस ने क्यों कहा- 'मसूद अजहर मोमेंट'?

वैनडाइक को अमेरिका जाने की अनुमति मिलने के बाद कांग्रेस नेताओं ने केंद्र सरकार पर सवाल उठाए हैं। कांग्रेस नेता सरल पटेल ने सोशल मीडिया पर इसे नरेंद्र मोदी सरकार का 'मसूद अजहर मोमेंट' बताया। वहीं जयराम रमेश ने वैनडाइक के मामले में अमेरिकी दबाव की आशंका जताते हुए सरकार से सवाल किया कि आखिर इस घटनाक्रम के बदले भारत को क्या मिला। ये राजनीतिक आरोप हैं; उपलब्ध अदालती आदेश में अमेरिकी दबाव को यात्रा की अनुमति का आधार नहीं बताया गया है। कांग्रेस नेताओं का सवाल मुख्य रूप से यह है कि जिस व्यक्ति के खिलाफ शुरुआत में यूएपीए के तहत जांच की गई, उसे जांच पूरी होने से पहले देश से बाहर जाने की अनुमति क्यों मिली।

मसूद अजहर का मामला क्या था?

मसूद अजहर का मामला 1999 के कंधार विमान अपहरण से जुड़ा था। दिसंबर 1999 में इंडियन एयरलाइंस की फ्लाइट आईसी-814 को हाईजैक कर अफगानिस्तान के कंधार ले जाया गया था। यात्रियों और चालक दल की रिहाई के बदले तत्कालीन केंद्र सरकार ने मसूद अजहर समेत तीन कैदियों को रिहा किया था। बाद में अजहर ने जैश-ए-मोहम्मद नाम का आतंकी संगठन बनाया। यही वजह है कि वैनडाइक के मामले में आलोचक 1999 की उस घटना का उदाहरण दे रहे हैं। हालांकि दोनों मामलों के बीच कानूनी और परिस्थितिजन्य अंतर काफी बड़ा है।

वैनडाइक केस और मसूद अजहर मामले में बड़ा अंतर

दोनों मामलों की तुलना जिस आधार पर की जा रही है, वह मुख्य रूप से एक गंभीर मामले का आरोपी भारत से बाहर जाना है। लेकिन कानूनी प्रक्रिया अलग है। 1999 में मसूद अजहर की रिहाई सरकार के फैसले के तहत हुई थी और यह फैसला विमान में बंधक बनाए गए यात्रियों की रिहाई के बदले लिया गया था। वैनडाइक के मामले में अदालत ने उसे किसी सौदे के तहत रिहा नहीं किया। उसे पहले डिफॉल्ट बेल मिली और फिर अदालत ने सीमित अवधि के लिए विदेश जाने की अनुमति दी। अदालत के आदेश में कहा गया कि आरोपी एक महीने बाद भारत लौटेंगे और जांच में जरूरत पड़ने पर सहयोग करेंगे।

मैथ्यू वैनडाइक कौन है?

मैथ्यू एरॉन वैनडाइक अमेरिकी नागरिक है। वह खुद को पूर्व पत्रकार, फिल्ममेकर और 'फ्रीडम फाइटर' के तौर पर पेश करता रहा है। वैनडाइक वर्ष 2011 में लीबिया में मुअम्मर गद्दाफी के खिलाफ लड़ने वाले विद्रोही गुटों के साथ जुड़ा था। संघर्ष के दौरान उसे पकड़ा भी गया था। बाद में गद्दाफी शासन के पतन के दौरान वह जेल से बाहर निकल गया। इसके बाद वह सैन्य प्रशिक्षण से जुड़ी गतिविधियों में भी नजर आया। 2022 में यूक्रेन के ल्वीव में उसकी तस्वीरें सामने आई थीं, जहां वह Sons of Liberty International यानी SOLI से जुड़े लोगों के साथ दिखाई दिया था। उसके बारे में CIA एजेंट, NATO के लिए काम करने वाले व्यक्ति या भाड़े के लड़ाके जैसे दावे भी किए जाते रहे हैं। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध अदालत रिकॉर्ड से नहीं होती, इसलिए इन्हें स्थापित तथ्य के तौर पर पेश नहीं किया जा सकता।

म्यांमार ट्रेनिंग कैंप केस में क्या आरोप हैं?

एनआईए के मुताबिक, वैनडाइक और छह यूक्रेनी नागरिक मार्च में भारत आए थे। एजेंसी का आरोप है कि समूह ने मिजोरम के रास्ते म्यांमार में प्रवेश किया और वहां जातीय सशस्त्र समूहों के लिए ड्रोन युद्ध, ड्रोन संचालन, असेंबली और जैमिंग तकनीक से जुड़ी ट्रेनिंग की कथित योजना बनाई। एनआईए ने यह भी आरोप लगाया कि यूरोप से ड्रोन की खेप मिजोरम में कुछ लोगों और समूहों तक पहुंचाई गई थी। एजेंसी ने इस मामले में शुरुआत में यूएपीए की धारा 18 के तहत आतंकी साजिश की जांच की थी। हालांकि इन आरोपों पर अभी अंतिम न्यायिक फैसला नहीं आया है।

UAPA की जांच जारी है, फिर चार्जशीट में धाराएं क्यों नहीं?

वैनडाइक को 13 मार्च को गिरफ्तार किया गया था। यूएपीए मामले में जांच के लिए अदालत से 180 दिन की अवधि मिली थी, जो 8 सितंबर को खत्म हुई। उसी दिन एनआईए ने चार्जशीट दाखिल की, लेकिन उसमें यूएपीए की धाराएं शामिल नहीं थीं। चार्जशीट में इमिग्रेशन और फॉरेनर्स एक्ट के तहत आरोप लगाए गए। एनआईए ने अदालत में यह भी कहा कि यूएपीए से जुड़े पहलू की जांच अभी पूरी नहीं हुई है। यानी एजेंसी ने मामले को बंद नहीं किया है और आगे जांच जारी रखी जा सकती है।

डिफॉल्ट बेल कैसे मिली?

दिल्ली की विशेष एनआईए अदालत ने 18 सितंबर को वैनडाइक को डिफॉल्ट बेल दी। अदालत ने माना कि जांच की निर्धारित अवधि खत्म होने तक यूएपीए के आरोपों वाली पूरी चार्जशीट दाखिल नहीं हुई थी। अदालत ने चार्जशीट को 'piecemeal' यानी अधूरी/टुकड़ों में दाखिल की गई चार्जशीट माना और कहा कि जांच एजेंसी अधूरी चार्जशीट के जरिए आरोपी के वैधानिक डिफॉल्ट बेल के अधिकार को नहीं रोक सकती। इसका अर्थ यह नहीं है कि अदालत ने वैनडाइक को आरोपों से बरी कर दिया है।

फिर वैनडाइक अमेरिका कैसे चला गया?

डिफॉल्ट बेल मिलने के बाद वैनडाइक ने अदालत में अमेरिका जाने की अनुमति मांगी। 24 सितंबर को विशेष अदालत ने वैनडाइक और छह यूक्रेनी नागरिकों को एक महीने के लिए अपने-अपने देशों में जाने की अनुमति दे दी। वैनडाइक को अमेरिका और बाकी छह को यूक्रेन जाने की इजाजत मिली। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि विदेश यात्रा संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत अधिकारों से जुड़ी है और इस अधिकार को केवल हल्के में नहीं लिया जा सकता। साथ ही जांच की जरूरत और आरोपी के यात्रा अधिकार के बीच संतुलन जरूरी है।

NIA ने खुद नहीं कहा कि वैनडाइक को भारत में रोकना जरूरी है

यहां मामला और दिलचस्प हो जाता है। अदालत के आदेश के मुताबिक, एनआईए ने यह नहीं कहा कि वैनडाइक या बाकी आरोपियों की निकट भविष्य में भारत में मौजूदगी जांच पूरी करने के लिए जरूरी है। एजेंसी ने आरोपियों से उनके पते, फोन नंबर और ईमेल जैसी जानकारी लेने तथा जरूरत पड़ने पर जांच में सहयोग लेने की बात कही। अदालत ने इसी आधार पर उन्हें सीमित अवधि के लिए विदेश जाने की अनुमति दी। शर्त यह है कि उन्हें एक महीने के भीतर भारत लौटना होगा और जरूरत पड़ने पर एनआईए की जांच में शामिल होना होगा। रिपोर्ट के मुताबिक वैनडाइक ने भारत लौटने के लिए 21 अक्टूबर की फ्लाइट भी बुक की है।

क्या NIA ने वैनडाइक को क्लीन चिट दे दी?

ऐसा कहना सही नहीं होगा। एनआईए ने यूएपीए की जांच बंद करने की घोषणा नहीं की है। अदालत के रिकॉर्ड में भी जांच जारी रहने की बात दर्ज है। आगे अगर एजेंसी को पर्याप्त सबूत मिलते हैं तो सप्लीमेंट्री चार्जशीट दाखिल की जा सकती है। इसलिए वैनडाइक का विदेश जाना मामले से बरी होना नहीं है। वह अदालत की अनुमति और शर्तों के तहत सीमित अवधि के लिए अमेरिका गया है।

विपक्ष का सबसे बड़ा सवाल क्या है?

कांग्रेस और सरकार की आलोचना करने वाले लोगों का मुख्य सवाल यह है कि अगर वैनडाइक के खिलाफ आतंकी साजिश के पहलू पर जांच अभी बाकी है, तो उसे भारत से बाहर जाने की अनुमति देना कितना उचित है। जयराम रमेश ने आरोप लगाया कि वैनडाइक के मामले में अमेरिकी दबाव की भूमिका हो सकती है। पवन खेड़ा ने भी सरकार से सवाल किया कि जिस व्यक्ति पर गंभीर आरोप लगाए गए थे, उसे अमेरिका लौटने की अनुमति कैसे मिल गई। इन आरोपों का स्वतंत्र प्रमाण उपलब्ध नहीं है और अदालत के आदेश में अमेरिकी दबाव को फैसले की वजह नहीं बताया गया है।

सोशल मीडिया पर मसूद अजहर का नाम क्यों आया?

सोशल मीडिया पर तुलना का आधार मुख्य रूप से 1999 का कंधार कांड है। आलोचक कह रहे हैं कि उस समय भारतीय यात्रियों की रिहाई के लिए मसूद अजहर को छोड़ा गया था, जबकि अब एक विदेशी नागरिक, जिसके खिलाफ शुरुआत में यूएपीए के तहत जांच हुई, उसे अदालत की अनुमति से भारत से बाहर जाने दिया गया। लेकिन दोनों घटनाओं को एक ही तरह का मामला बताना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा। मसूद अजहर की रिहाई एक बंधक संकट में सरकार द्वारा किए गए फैसले का हिस्सा थी। वैनडाइक का विदेश जाना अदालत के आदेश, डिफॉल्ट बेल और तय शर्तों के तहत हुआ है।

असली सवाल अब क्या है?

वैनडाइक की कहानी में फिलहाल तीन चीजें सबसे अहम हैं—पहली, एनआईए ने उसके खिलाफ यूएपीए के तहत जांच शुरू की; दूसरी, 180 दिन की अवधि खत्म होने तक यूएपीए वाली चार्जशीट दाखिल नहीं हुई, जिसके बाद उसे डिफॉल्ट बेल मिली; और तीसरी, अदालत ने एनआईए की आपत्ति के बिना उसे एक महीने के लिए अमेरिका जाने की अनुमति दी। यही घटनाक्रम इस मामले को राजनीतिक विवाद में बदल रहा है। आगे निर्णायक बात यह होगी कि एनआईए की लंबित यूएपीए जांच में क्या सामने आता है और वैनडाइक तय समय पर भारत लौटकर जांच में शामिल होता है या नहीं।

क्यों एनआईए ने वैनडाइक की जमानत का विरोध नहीं किया? 

म्यांमार ट्रेनिंग कैंप मामले में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने अमेरिकी नागरिक मैथ्यू एरॉन वैनडाइक और छह यूक्रेनी नागरिकों की जमानत का विरोध नहीं किया, क्योंकि एजेंसी तय 180 दिनों की अवधि के भीतर UAPA के तहत चार्जशीट दाखिल करने में विफल रही थी। हालांकि, 8 सितंबर को दाखिल पहली चार्जशीट में UAPA की जगह इमीग्रेशन और फॉरेनर्स एक्ट के प्रावधान जोड़े गए थे। इस पर टिप्पणी करते हुए न्यायाधीश शर्मा ने शुक्रवार 18 सितम्बर को 'बार एंड बेंच' से कहा कि जांच एजेंसी अधूरा आरोपपत्र दाखिल करके आरोपियों को डिफॉल्ट जमानत से वंचित नहीं कर सकती। यह BNSS की धारा 187(3) और UAPA की धारा 43D के नियमों का उल्लंघन होगा। उधर, एनआईए ने अदालत को अवगत कराया कि मामले के आतंकी पहलुओं की जांच अभी जारी है और सबूत मिलने पर सप्लीमेंट्री चार्जशीट दायर की जाएगी। इस बीच, राउज एवेन्यू कोर्ट ने सभी सातों आरोपियों को एक महीने के लिए स्वदेश जाने की अनुमति दे दी, जिसके बाद वैनडाइक तिहाड़ जेल से रिहा होकर अमेरिका रवाना हो गए।