विजेता विशाल की ये कहानी सिर्फ उनकी सफलता की कहानी नहीं, बल्कि इस पीढ़ी के युवाओं के लिए एक मिसाल भी है, जो हर साल डिफेंस परीक्षा की तैयारी करते हैं और फेल होने के बाद अपनी उम्मीद हार जाते हैं। SSB परीक्षा सिर्फ किताबी ज्ञान नहीं, बल्कि इंसान के चरित्र और उसके आत्मविश्वास जैसी चीजों की भी परीक्षा होती है। जिसके कारण ही इस परीक्षा में बार-बार प्रयास करने वाले लोगों की अलग ही अहमियत होती है। विजेता विशाल की कहानी ये बात साबित करती है कि मेहनत कभी जाया नहीं जाती और उसका फल हमेशा मीठा ही होता है। इसी लगन के साथ बिहार के विजेता विशाल ने अपना ही नहीं, बल्कि अपने पिताजी का सपना भी साकार कर दिखाया।
11वीं बार में मेहनत रंग लाई
बिहार के नवादा जिले के एक छोटे-से गांव डोहरा से एक नौजवान की कहानी सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही है। कई सालों से कठिन परिश्रम करने के बाद भी उनको असफलता का सामना करना पड़ा। बार-बार SSB इंटरव्यू में फेल होते रहे, किस्मत ने साथ नहीं दिया।एक बार नहीं, दो बार नहीं बल्कि 10 बार SSB की परीक्षा में उनको असफलता प्राप्त हुई। हर बार इतनी मेहनत के बावजूद उनको खाली हाथ लौटना पड़ता था। कोई आम इंसान ऐसे ही उम्मीद हार बैठता, लेकिन विजेता ने हार स्वीकार करने के बजाए हर बार अपनी गलतियों से सीखा, उनको सुधारा और फिर मैदान में उतरे और उनकी इसी लगन ने अंत में उनको उनकी मंजिल तक पंहुचा दिया।
पहले CDS फिर OTA
विजेता ने अपनी शुरुआती पढ़ाई सैनिक स्कूल नालंदा से की थी, फिर दिल्ली यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन किया। विजेता विशाल का अपनी मंजिल तक पहुंचने का पहला पड़ाव था UPSC की CDS यानी कि कंबाइंड डिफेन्स सर्विसेज एग्जाम को पास करना और उन्होंने इस चुनौती को अपनी मेहनत से पार कर लिया। जिसके बाद उनकी चेन्नई के ऑफिसर्स ट्रेनिंग अकादमी में कड़ी ट्रेनिंग शुरू हो गई। महीनों की मेहनत और परिश्रम के बाद जब पासिंग आउट परेड हुई, तो उनके कंधों पर वो अफसर के सितारे सजे तो उनका सपना सपना नहीं बल्कि हकीकत बन गए।
पिता का अधूरा सपना किया बेटे ने पूरा
इस पूरी कहानी का पूरा मूल सिर्फ परिश्रम और मेहनत से सफलता प्राप्त करना नहीं था, बल्कि इस कहानी का सबसे भावुक पल तो कुछ और था। विजेता विशाल के पिता धनंजय कुमार धीरज खुद भारतीय सेना की बिहार रेजिमेंट की 7वीं बटालियन में नायब सूबेदार के तौर पर हिस्सा रह चुके हैं। वो भी अफसर बनने की चाह रखते थे, लेकिन अफसोस वो सिर्फ JCO के पद तक ही पहुंच सके। जिसके बाद उन्होंने ठान लिया कि अगर वो खुद ये मंजिल हासिल नहीं कर पाए, तो वो अपने बेटे को शिक्षा देंगे और उसको ये कामयाबी हासिल करने में पूरी सहायता करेंगे। जिसके बाद शुरू हुआ मेहनत और परिश्रम का वो सफर जिसने आज विजेता को अफसर बनने के मुकाम तक पंहुचा दिया।
पिता ने दी बेटे को सलामी
पासिंग आउट परेड के दौरान जब सब अफसर अपने परिवार वालों के साथ ये खुशी का पल मन रहे थे, तब सबकी नजरें एक ऐसे खास पल की तरफ मुड़ीं जिसने सिर्फ विजेता के परिवार वालों को ही नहीं, बल्कि आस-पास के सभी लोगों को भावुक कर दिया। पिता धनंजय कुमार ने खुद अपने बेटे लेफ्टिनेंट विजेता विशाल को फौजी अंदाज में सलामी दी। एक पिता जो खुद अपना सपना दुर्भाग्यपूर्ण पूरा नहीं कर पाए, वो आज अपने बेटे को गर्व से सीना चौड़ा करते हुए सलामी ठोक रहे थे। विजेता बेटे ने भी अपने पिता को सम्मान देते हुए उनके पैर छुए और ये पूरी परेड का सबसे भावुक पल था।