भारत के युवा निशानेबाज हिमांशु ढिल्लों ने अपने 21वें जन्मदिन को यादगार बनाया और एशियाई खेलों में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। आइची-नागोया एशियन गेम्स 2026 में हिमांशु ने पुरुषों की 10 मीटर एयर राइफल स्पर्धा में सिल्वर मेडल जीता है। फाइनल मुकाबले में उन्होंने 252.4 अंक हासिल किए। चीन के शेंग लिहाओ ने 254.2 अंक के साथ गोल्ड जीता, जबकि भारत के ही रुद्रांक्ष पाटिल ने 230.9 अंक के साथ ब्रॉन्ज मेडल हासिल किया।
पहले आजमाया कुश्ती में हाथ
हिमांशु की यह कामयाबी इसलिए भी खास है क्योंकि उनका खेल सफर शुरुआत से शूटिंग के इर्द-गिर्द नहीं रहा। उन्होंने पहले कुश्ती में हाथ आजमाया, लेकिन कुछ ही समय बाद इस खेल को छोड़ दिया। इसके बाद कोरोना महामारी के दौरान पिता के साथ खेतों में काम करने का अनुभव भी उनके जीवन का हिस्सा बना। शूटिंग से उनका जुड़ाव भी अचानक हुआ, लेकिन धीरे-धीरे यही खेल उनकी पहचान बन गया।
कुश्ती से हुई शुरुआत, लेकिन ज्यादा दिन नहीं टिके
हिमांशु का परिवार कुश्ती से जुड़ा रहा है। उनके चाचा हरदीप सिंह ढिल्लों ने रियो ओलंपिक में ग्रीको-रोमन कुश्ती की 98 किलोग्राम कैटेगरी में भारत का प्रतिनिधित्व किया था। परिवार चाहता था कि हिमांशु भी इसी परंपरा को आगे बढ़ाएं। इसी वजह से उन्होंने कुश्ती की ट्रेनिंग शुरू की। हालांकि, कुश्ती की कड़ी ट्रेनिंग और शरीर पर पड़ने वाले असर के कारण हिमांशु ज्यादा समय तक इस खेल में नहीं टिक सके। इसके बाद उनके करियर की दिशा एक अलग खेल की ओर मुड़ गई।
पिता के साथ खेतों में किया काम
कुश्ती छोड़ने के बाद कोरोना लॉकडाउन का दौर आया। उस समय हिमांशु अपने पिता के साथ खेतों में काम करने लगे। धान की खेती और गर्मी में खेतों में मेहनत करने का यह दौर उनके लिए आसान नहीं था, लेकिन इस अनुभव ने उन्हें संयम और मेहनत का महत्व समझाया। हिमांशु ने शूटिंग को भी शुरुआत में अपेक्षाकृत आसान खेल समझकर चुना था। मगर जब उन्होंने वास्तव में शूटिंग रेंज में ट्रेनिंग शुरू की, तो उन्हें समझ आया कि इस खेल में शारीरिक क्षमता के साथ-साथ मानसिक नियंत्रण और एकाग्रता भी बेहद जरूरी है।
परिवार ने भी लिया बड़ा जोखिम
शूटिंग को गंभीरता से अपनाने के बाद हिमांशु के परिवार ने उनके करियर में पूरा साथ दिया। रिपोर्टों के मुताबिक, परिवार ने करीब तीन लाख रुपये की राइफल खरीदने का फैसला लिया था। यह निवेश ऐसे समय में किया गया जब हिमांशु का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ा नाम नहीं था। हिमांशु ने धीरे-धीरे घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनानी शुरू की। 2026 में सीनियर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कदम रखने के बाद उनका सफर तेजी से आगे बढ़ा और एशियाई खेलों में उन्होंने अपने पहले ही अभियान में व्यक्तिगत पदक हासिल कर लिया।
टीम स्पर्धा में भी मिला सिल्वर
हिमांशु का एशियन गेम्स अभियान सिर्फ व्यक्तिगत पदक तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने रुद्रांक्ष पाटिल और 18 वर्षीय पार्थ माने के साथ मिलकर पुरुषों की 10 मीटर एयर राइफल टीम स्पर्धा में भी भारत को सिल्वर मेडल दिलाया। भारतीय टीम ने 1890.1 अंक जुटाए, जबकि चीन ने 1899.0 अंक के साथ गोल्ड जीता। इसके बाद व्यक्तिगत फाइनल में हिमांशु और रुद्रांक्ष ने भारत के लिए एक साथ दो पदक पक्के किए।
जन्मदिन पर दोहरी खुशी
21 सितंबर हिमांशु के लिए सिर्फ एशियाई खेलों का दिन नहीं था, बल्कि उनका 21वां जन्मदिन भी था। ऐसे में एक ही दिन टीम और व्यक्तिगत स्पर्धा में सिल्वर मेडल जीतना उनके करियर की अब तक की सबसे खास उपलब्धियों में शामिल हो गया है। कुश्ती के अखाड़े से शुरू होकर खेतों में मेहनत और फिर शूटिंग रेंज तक पहुंचा हिमांशु का सफर बताता है कि खेल करियर हमेशा एक सीधी राह पर नहीं चलता। कई बार शुरुआती असफलताएं और बदले हुए फैसले ही आगे की मंजिल का रास्ता तैयार करते हैं। हिमांशु ने भी अपने सफर में कई मोड़ देखे और आखिरकार एशियाई खेलों के मंच पर भारत के लिए पदक जीतने में कामयाब रहे।