हिमाचल प्रदेश से लद्दाख को जोड़ने वाली सामरिक रूप से बेहद अहम बिलासपुर-मनाली-लेह रेलवे लाइन परियोजना को लेकर आने वाले कुछ महीनों में गतिविधियां तेज हो सकती हैं। करीब 489 किलोमीटर लंबी इस प्रस्तावित रेललाइन पर अब तक कई सर्वे और अध्ययन किए जा चुके हैं। हिमालय के दुर्गम भूभाग और बदलती जलवायु से जुड़ी चुनौतियों के कारण परियोजना की योजना और निर्माण में विशेष सावधानी बरतने की जरूरत है। रेलवे की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) के अनुसार, इस रेललाइन पर करीब 1.31 लाख करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। परियोजना में देरी होने पर इसकी लागत और बढ़ सकती है। इस मार्ग पर लगभग 60 सुरंगें बनाई जानी हैं, जिनकी कुल लंबाई करीब 270 किलोमीटर होगी।

489 किलोमीटर लंबी होगी रेललाइन, 60 सुरंगों से गुजरेगी

बिलासपुर से शुरू होने वाली यह रेललाइन हिमाचल प्रदेश के सुंदरनगर, मंडी, मनाली, सिस्सू, दारचा और केलांग होते हुए लद्दाख के सरचू, पांग, रुमत्से, उपशी और खारू तक पहुंचेगी। इसका अंतिम स्टेशन लेह में प्रस्तावित है। रेलवे लाइन की कुल लंबाई करीब 489 किलोमीटर होगी। सेना की रणनीतिक जरूरतों को ध्यान में रखते हुए लेह से साशरथांग तक 13 किलोमीटर का अतिरिक्त विस्तार भी प्रस्तावित है। इस रूट पर तेंगला में करीब 5,359 मीटर की ऊंचाई पर दुनिया का सबसे ऊंचा रेलवे स्टेशन बनाने की योजना है।

No photo description available.

जलवायु परिवर्तन और बर्फीले क्षेत्रों की चुनौतियों पर नया अध्ययन

परियोजना को लेकर हालिया वैज्ञानिक अध्ययन में मनाली-लेह रेलखंड पर भू-तकनीकी और क्रायोस्फेरिक जांच को व्यापक स्तर पर कराने की जरूरत बताई गई है। इसका उद्देश्य जलवायु परिवर्तन के कारण पैदा होने वाले खतरों, भूस्खलन और जमीन की अस्थिरता से रेललाइन को सुरक्षित रखना है। आईआईटी मंडी के सिविल एंड एनवायरनमेंटल इंजीनियरिंग स्कूल के तीन शोधकर्ताओं ने इस क्षेत्र का अध्ययन किया है। शोध के मुताबिक, प्रस्तावित रेलमार्ग का लगभग 8 प्रतिशत हिस्सा बहुत अधिक संवेदनशील क्षेत्र में आता है, जबकि करीब 21 प्रतिशत क्षेत्र उच्च संवेदनशीलता और 30 प्रतिशत मध्यम संवेदनशीलता वाले इलाके में है। लगभग 42 प्रतिशत हिस्सा कम या बहुत कम संवेदनशील श्रेणी में रखा गया है। अध्ययन में बताया गया है कि रेललाइन का कुछ हिस्सा पर्माफ्रॉस्ट यानी ऐसे क्षेत्रों से होकर गुजरेगा, जहां जमीन लंबे समय तक जमी रहती है। तापमान में बदलाव के कारण ऐसी जमीन अस्थिर हो सकती है, जिससे सुरंगों, पुलों और रेलवे ट्रैक के ढांचे को नुकसान पहुंचने का खतरा रहता है।

सेना की आवाजाही और पर्यटन को मिलेगा फायदा

बिलासपुर-मनाली-लेह रेललाइन को रक्षा मंत्रालय की ओर से सामरिक महत्व की परियोजना के रूप में चिह्नित किया गया है। इसके बनने से पंजाब, दिल्ली और हरियाणा से लद्दाख तक सेना के जवानों और सैन्य साजो-सामान की आवाजाही आसान हो सकेगी। फिलहाल सर्दियों में भारी बर्फबारी के कारण लद्दाख का सड़क संपर्क कई महीनों तक प्रभावित रहता है। रेललाइन तैयार होने पर क्षेत्र को हर मौसम में रेल कनेक्टिविटी मिलने की उम्मीद है। इससे स्थानीय लोगों को भी देश के दूसरे हिस्सों तक आने-जाने में सुविधा होगी। साथ ही हिमाचल प्रदेश और लद्दाख में पर्यटन तथा स्थानीय कारोबार को बढ़ावा मिल सकता है।

No photo description available.

परियोजना की राह में कई तकनीकी चुनौतियां

हिमालय का कठिन भूगोल इस परियोजना के निर्माण में बड़ी चुनौती है। अत्यधिक ऊंचाई, बर्फबारी, तापमान में भारी अंतर, भूस्खलन और जमीन की अस्थिरता को ध्यान में रखते हुए रेलमार्ग की डिजाइन तैयार करनी होगी। सुरंगों और पुलों के निर्माण के दौरान भूगर्भीय परिस्थितियों की विस्तृत जांच भी जरूरी होगी। रेलवे की ओर से मार्च 2026 में दी गई जानकारी के मुताबिक, 489 किलोमीटर लंबी इस रेललाइन का सर्वे पूरा हो चुका है और विस्तृत परियोजना रिपोर्ट भी तैयार है। परियोजना को अंतिम मंजूरी और निर्माण के लिए आगे की प्रक्रियाएं पूरी करनी होंगी। ऐसे में आने वाले महीनों में होने वाली तकनीकी जांच और अध्ययन इसके अगले चरण की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।