Mercury to Gold : सोना बनाने का ख्वाब इंसान सदियों से देखता आया है। पुराने जमाने में इसे कीमियागिरी कहा जाता था। अब विज्ञान की दुनिया से हैरान करने वाली खबर आई है। अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को स्थित स्टार्टअप कंपनी मैराथन फ्यूजन ने दावा किया है कि उसने परमाणु विज्ञान (न्यूक्लियर साइंस) की मदद से पारे को असली सोने में बदलने में बड़ी सफलता हासिल की है। कंपनी का कहना है कि उसने फ्यूजन प्रक्रिया के दौरान निकलने वाले न्यूट्रॉन का इस्तेमाल करके पारे को सोने (Gold) में तब्दील कर दिया है।
सोना निर्माण की रफ्तार पिछली बार से 10 गुना तेज
उनका दावा है कि इस बार सोने के निर्माण की रफ्तार साल 2025 में मशहूर वैज्ञानिक प्रयोगशाला CERN द्वारा बनाए गए रिकॉर्ड से भी 10 गुना ज्यादा तेज है। वैसे, यह भले किसी साइंस फिक्शन फिल्म जैसा लगे, लेकिन इसका आधार पूरी तरह से परमाणु भौतिकी है। मजे की बात है कि मैराथन फ्यूजन का मकसद सिर्फ सोना बनाना नहीं है, बल्कि वह इस तकनीक के जरिए कैंसर के इलाज में काम आने वाले बेहद कीमती मेडिकल आइसोटोप भी तैयार कर रहा।
आखिर पारे से सोना कैसे बनता है?
आम रासायनिक प्रतिक्रियाओं से किसी तत्व का रूप नहीं बदला जा सकता, क्योंकि उनमें केवल अणु या इलेक्ट्रॉन ही इधर-उधर होते हैं। मगर, पारे को सोने में बदलने का पूरा खेल न्यूक्लियर ट्रांसम्यूटेशन यानी परमाणु रूपांतरण पर टिका है। इसके तहत किसी तत्व के परमाणु के केंद्र यानी न्यूक्लियस के भीतर बदलाव करके उसे एक अलग ही तत्व में बदल दिया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में पारे के एक विशेष रूप यानी आइसोटोप मरकरी-198 का उपयोग किया जाता है। आइसोटोप मूल रूप से एक तत्व के ऐसे रूप होते हैं, जिनके केंद्र में न्यूट्रॉन की गिनती अलग-अलग होती है।
आइडिया पूरी तरह नया नहीं
पारे से सोना बनाने का यह आइडिया पूरी तरह नया नहीं है। इससे पहले दुनिया की जानी-मानी लैबोरेटरी CERN ने भी अपने लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर के एलिस एक्सपेरिमेंट में चार साल की कड़ी मेहनत के बाद परमाणु प्रक्रियाओं के जरिए बेहद मामूली मात्रा में सोना बनाया था। उस समय केवल 29 पिकोग्राम सोना ही तैयार हो पाया था। बता दें कि एक पिकोग्राम एक ग्राम का खरबवां हिस्सा होता है, यानी वह इतनी कम मात्रा थी कि उसका कोई कमर्शियल इस्तेमाल मुमकिन ही नहीं था। अब मैराथन फ्यूजन का दावा है कि उसने फ्यूजन न्यूट्रॉन की ताकत से इस प्रक्रिया की दर को CERN के रिकॉर्ड से दस गुना आगे पहुंचा दिया है। कंपनी ने सोशल मीडिया पर यह जानकारी साझा करते हुए बताया है कि वह अपने सैद्धांतिक प्रस्तावों से बहुत आगे निकल चुकी है। वैसे, वैज्ञानिकों का मानना है कि कंपनी के इन दावों की अभी स्वतंत्र रूप से पुष्टि होना और बड़े पैमाने पर सस्ता सोना बनना बाकी है, इसलिए इसमें अभी लंबा रास्ता तय करना है।
कैंसर के इलाज में भी मददगार है यह तकनीक
मैराथन फ्यूजन केवल सोने के लालच में यह सब नहीं कर रही है। उनका मुख्य फोकस चिकित्सा जगत पर भी है। कंपनी का उद्देश्य परमाणु संलयन (फ्यूजन) से पैदा होने वाले न्यूट्रॉन की मदद से ऐसे रेडियोएक्टिव आइसोटोप तैयार करना है जो कैंसर जैसी गंभीर बीमारी की जांच और इलाज में रामवाण साबित होते हैं। आज के समय में ये आइसोटोप मेडिकल साइंस में बहुत अहम भूमिका निभा रहे हैं। कुछ खास आइसोटोप शरीर के भीतर छुपे ट्यूमर और कैंसर कोशिकाओं का सटीक पता लगाने में मदद करते हैं, तो कुछ ट्यूमर तक सीधे रेडिएशन पहुंचाने का काम करते हैं।
इस दिशा में कंपनी ने एक और बड़ा कदम उठाते हुए जिंक (Zinc) पर न्यूट्रॉन की बौछार करके रेडियोएक्टिव कॉपर आइसोटोप तैयार करने के प्रयोग भी शुरू कर दिए हैं। कंपनी का कहना है कि उन्होंने फ्यूजन से बने न्यूट्रॉन की मदद से जिंक को इर्रेडिएट करके कॉपर आइसोटोप बनाने की शुरुआत कर दी है। इनमें 'कॉपर-64' का इस्तेमाल डायग्नोस्टिक इमेजिंग यानी स्कैनिंग में किया जाता है, जबकि 'कॉपर-67' पर अभी परीक्षण चल रहा है और आने वाले समय में इसका उपयोग टारगेटेड रेडियोन्यूक्लाइड थेरेपी में किया जाएगा। मैराथन का तर्क है कि भविष्य में जब इन चीजों की मांग तेजी से बढ़ेगी, तो फ्यूजन रिएक्टर मेडिकल आइसोटोप का एक नया और बड़ा जरिया बनकर उभरेंगे।