केंद्र सरकार महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े संविधान संशोधन विधेयकों को आगे बढ़ाने के लिए इसी महीने संसद का विशेष सत्र बुलाने पर विचार कर रही है। रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार इन विधेयकों को पारित कराने के लिए विभिन्न राजनीतिक दलों से समर्थन जुटाने में लगी है। अप्रैल में लोकसभा में जरूरी दो-तिहाई बहुमत नहीं मिलने के कारण संबंधित संविधान संशोधन विधेयक पारित नहीं हो पाया था। अब सरकार दोबारा समर्थन जुटाने की कोशिश कर रही है। 

DMK और छोटे दलों से संपर्क में सरकार

जानकारी के अनुसार, केंद्र सरकार तमिलनाडु की पार्टी DMK समेत कुछ क्षेत्रीय और छोटे दलों के संपर्क में है। DMK के लोकसभा में 22 सांसद हैं। रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से बताया गया है कि सरकार विधेयकों के समर्थन में जरूरी संख्या जुटाने की कोशिश कर रही है। परिसीमन के मुद्दे पर DMK पहले विरोध जताती रही है। ऐसे में सरकार की बातचीत और संभावित समर्थन को लेकर राजनीतिक घटनाक्रम पर नजर बनी हुई है। संबंधित दलों के समर्थन को लेकर अंतिम स्थिति संसदीय प्रक्रिया के दौरान ही स्पष्ट होगी। 

विशेष सत्र की तारीखों पर अभी अंतिम फैसला नहीं

संसद के विशेष सत्र की तारीखें 26 और 27 अक्टूबर को संविधान सदन में होने वाले 12वें BRICS संसदीय फोरम को ध्यान में रखकर तय की जा सकती हैं। सूत्रों के अनुसार, यदि सत्र बुलाने का फैसला होता है तो सांसदों को करीब एक सप्ताह पहले सूचना दी जा सकती है। मॉनसून सत्र 13 अगस्त को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हुआ था, लेकिन उसका औपचारिक सत्रावसान अब तक नहीं हुआ है। रिपोर्ट में इसे विशेष सत्र की संभावना के संदर्भ में महत्वपूर्ण बताया गया है। फिलहाल सरकार की ओर से सत्र की तारीखों की आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। 

अप्रैल में क्यों अटक गया था विधेयक?

महिला आरक्षण को लागू करने और परिसीमन से जुड़े बदलावों के लिए अप्रैल 2026 में लोकसभा में एक संविधान संशोधन विधेयक पेश किया गया था। संविधान संशोधन के लिए आवश्यक विशेष बहुमत न मिल पाने के कारण यह विधेयक पारित नहीं हो सका। इस मतदान में कुल 528 सांसदों ने भाग लिया था, जिनमें से 298 सांसदों ने इसके पक्ष में और 230 सांसदों ने इसके विरोध में मतदान किया। उस समय दो-तिहाई बहुमत के लिए 352 मतों की जरूरत थी। इस तरह विधेयक आवश्यक संख्या से पीछे रह गया।

महिला आरक्षण कानून में क्या प्रावधान है?

नारी शक्ति वंदन अधिनियम के तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए लगभग एक-तिहाई सीटें आरक्षित करने का प्रावधान है। इसके लागू होने की प्रक्रिया परिसीमन और संबंधित संवैधानिक प्रावधानों से जुड़ी हुई है। सरकार जिन प्रस्तावों को आगे बढ़ाना चाहती है, उनमें महिला आरक्षण के क्रियान्वयन और निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्निर्धारण से जुड़े बदलाव शामिल हैं। परिसीमन के तहत लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं तथा प्रतिनिधित्व के ढांचे में बदलाव हो सकता है। इस प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक दलों के बीच मतभेद भी हैं। कुछ विपक्षी दलों ने आशंका जताई है कि परिसीमन से राज्यों के बीच संसद में प्रतिनिधित्व का संतुलन प्रभावित हो सकता है। इसलिए विधेयकों को लेकर चर्चा केवल महिला आरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्गठन और राज्यों की हिस्सेदारी भी इसका हिस्सा है। 

संविधान संशोधन के लिए दो-तिहाई बहुमत जरूरी

संविधान संशोधन विधेयक पारित करने के लिए संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है। आम तौर पर इसके लिए सदन में मौजूद और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है। इसके अलावा, संविधान के प्रावधानों के तहत सदन की कुल सदस्य संख्या से जुड़ी अनिवार्य शर्तें भी लागू होती हैं। इसी वजह से सरकार क्षेत्रीय दलों और अन्य राजनीतिक समूहों से बातचीत कर रही है। विधेयकों को पारित कराने के लिए समर्थन जुटाना इस संभावित विशेष सत्र का प्रमुख राजनीतिक पहलू होगा। 

आगे क्या होगा?

फिलहाल विशेष सत्र की आधिकारिक तारीखों और उसके एजेंडे की घोषणा का इंतजार है। यदि सरकार सत्र बुलाती है, तो महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े विधेयक फिर से संसद की चर्चा में आ सकते हैं। उनकी स्थिति सरकार द्वारा जुटाए गए समर्थन, सदन में बहस और मतदान के नतीजों पर निर्भर करेगी। सरकार की कोशिशों, DMK और अन्य दलों के रुख तथा विपक्ष की आपत्तियों के बीच आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर राजनीतिक गतिविधियां तेज रहने की संभावना है।