UP Election Seat Sharing News : उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की सुगबुगाहट तेज है। मुख्य मुकाबला बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए और सपा-कांग्रेस के इंडिया गठबंधन के बीच है। गठबंधन के भीतर भले सपा सीटों के मामले में कांग्रेस से काफी बड़ी पार्टी हो, लेकिन राष्ट्रीय पार्टी होने के चलते कांग्रेस भी बराबरी का हक मांगने से पीछे नहीं हट रही। कांग्रेस के नेता कभी आधी सीटों की मांग तो कभी थोड़ा झुककर 170 या 150 सीटों से कम पर बात नहीं करने की बात कहते हैं। ऐसे में दोनों दलों के बीच 'बड़ा भाई' कौन है, इसको लेकर नेताओं के बयानों में जंग छिड़ी है। आइए चुनावी आंकड़ों के आईने में पूरी असलियत को समझते हैं।
साल 2022 के चुनावी आंकड़ों पर एक नजर
पिछले विधानसभा चुनाव (2022) की बात करें तो सपा और कांग्रेस ने अलग-अलग चुनाव लड़ा था। आरएलडी और सुभासपा जैसे दलों के साथ गठबंधन के बावजूद सपा ने 403 में से 111 सीटों पर शानदार जीत दर्ज की थी। कांग्रेस के खाते में सिर्फ 2 सीटें आई थीं। उस चुनाव में 15 करोड़ 19 लाख 44 हजार 079 वोटर थे। इनमें से 60.2% यानी 9,15,25,592 लोगों ने मताधिकार का इस्तेमाल किया था। इसमें समाजवादी पार्टी को 2 करोड़ 95 लाख 43 हजार 934 वोट मिले। कांग्रेस को कुल 21 लाख 51 हजार 234 वोट हासिल हुए थे।
कांग्रेस की जमीनी स्थिति
कांग्रेस ने पिछला चुनाव अकेले लड़ा था। 403 में से सिर्फ दो सीटों पर जीत हासिल की थी। इन 2 जीती सीटों को छोड़ दिया जाए तो कांग्रेस की हालत यह थी कि उसे केवल 19 विधानसभा सीटों पर 20 हजार से ज्यादा वोट मिले थे। 21 सीटें ऐसी थीं, जहां कांग्रेस को 10 हजार से 20 हजार के बीच वोट मिले। 31 सीटें ऐसी रहीं, जहां पार्टी 5 हजार से 10 हजार वोट जुटा पाई। 19, 21 और 31 को मिला लें तो कुल 71 सीटें ऐसी बनती हैं, जहां कांग्रेस को 5 हजार से ऊपर वोट मिले। कुल 403 सीटों में से 2 पर कांग्रेस जीती और बाकी 401 सीटों में से 71 घटा दें तो आंकड़ा 330 पर पहुंचता है। यानी 330 सीटें ऐसी थीं, जहां कांग्रेस को अपने दम पर 5 हजार से कम वोट मिले। कई सीटें तो ऐसी थीं, जहां कांग्रेस उम्मीदवारों की जमानत तक जब्त हो गई थी।
लोकसभा चुनाव का हाल
लोकसभा चुनावों की तस्वीर देखें तो साल 2014 में कांग्रेस को सिर्फ 2 सीटें (सोनिया गांधी और राहुल गांधी) मिली थीं। साल 2019 में राहुल गांधी भी चुनाव हार गए और कांग्रेस सिमटकर सिर्फ 1 सीट पर आ गई। 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा के साथ गठबंधन कर लड़ने पर कांग्रेस के कुल 6 सांसद जीतने में कामयाब रहे।
कांग्रेस की दावेदारी और सीटों का हिसाब
जिन 73 सीटों (दो विधायकों वाली सीटें जोड़कर) पर कांग्रेस को 5 हजार से ज्यादा वोट मिले थे, उनमें से 16 सीटों पर समाजवादी पार्टी ने जीत दर्ज की थी। जब सीट शेयरिंग पर बात होगी तो कांग्रेस सबसे पहले उन्हीं सीटों की मांग करेगी, जहां उसे ठीक-ठाक वोट मिले हैं। 5 हजार वोट वाले आधार को भी पैमाना माना जाए तो 73 में से सपा के पास अपनी जीती 16 सिटिंग विधायकों वाली सीटें हैं, जिन्हें सपा गठबंधन में नहीं छोड़ेगी। इस तरह सपा की जीती हुई 16 सीटें घटाने के बाद कांग्रेस के पास केवल 57 सीटें ही ऐसी बचती हैं, जहां वह मजबूती से अपनी दावेदारी का दम दिखा सकती है। कांग्रेस का यह भी तर्क है कि अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बनना है तो उन्हें कुछ एडजस्ट यानी ज्यादा सीटें देनी होंगी। एक विधानसभा सीट पर औसतन 400 बूथ माने जाएं और कांग्रेस के 5 हजार वोटों से भाग दें तो हर बूथ पर कांग्रेस को औसतन 12.5 वोट मिलते हैं। 10 हजार वोटों वाली सीट पर यह आंकड़ा हर बूथ पर औसतन 25 वोट का हो जाता है। इसके मुकाबले सपा की सीटों का औसत देखा जाए तो सपा को एक विधानसभा में औसतन 50 हजार वोट मिलते हैं तो उसे हर बूथ पर कम-से-कम 125 वोट मिल रहे। यानी सपा को मिलने वाले वोट कांग्रेस से 10 गुना ज्यादा हैं।
जहां कांग्रेस को मिले थे 20 हजार से ज्यादा वोट
साल 2022 के चुनाव में जिन 19 सीटों पर कांग्रेस को 20 हजार से अधिक वोट मिले थे, उनमें मथुरा सदर, आगरा खेरागढ़, हरदोई बिलग्राम, रायबरेली बछरावां, अमेठी जगदीशपुर, कानपुर किदवई नगर, गोंडा गौरा, कुशीनगर तमकुहीराज, देवरिया रुद्रपुर, वाराणसी पिंडरा, रायबरेली सरैनी, अमेठी गौरीगंज, कानपुर गोविंदनगर, प्रयागराज उत्तरी, प्रयागराज कोराओं, बाराबंकी जैदपुर, अमेठी तिलोई, सिद्धार्थनगर शोहरतगढ़ और वाराणसी कैंट शामिल हैं।
कांग्रेस का प्रदर्शन जानें
जिन इलाकों में कांग्रेस को 5 हजार से ज्यादा वोट मिले, उनमें मथुरा, आगरा, हरदोई, रायबरेली, अमेठी, कानपुर, गोंडा, कुशीनगर, देवरिया, वाराणसी, प्रयागराज, बाराबंकी, सिद्धार्थनगर, रामपुर, गाजियाबाद, गौतमबुद्ध नगर, बुलंदशहर, अलीगढ़, शाहजहांपुर, लखनऊ, जालौन, हमीरपुर, बलरामपुर, जौनपुर और सोनभद्र की सीटें आती हैं। कई जिले ऐसे भी रहे जहाँ कांग्रेस को किसी भी विधानसभा सीट पर 5 हजार वोट भी नसीब नहीं हुए। यह साफ दिखाता है कि भले ही कांग्रेस देश की सबसे पुरानी पार्टी होने का दावा करे, लेकिन जब उत्तर प्रदेश की जमीनी राजनीति की बात आती है तो वर्तमान हालात में समाजवादी पार्टी स्पष्ट रूप से 'बड़े भाई' की भूमिका में खड़ी नजर आती है।
कांग्रेस और सपा के अपने-अपने तर्क
इन आंकड़ों पर यूपी कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष और सांसद इमरान मसूद सपा को नसीहत देते हैं। उनका कहना है कि दिल्ली में कांग्रेस की 15 साल पुरानी सरकार को नई-नवेली आम आदमी पार्टी ने गिराया था, इसलिए किसी भी दल को पुराना इतिहास देखने के बजाय वर्तमान स्थिति देखनी चाहिए। उनका दावा है कि कांग्रेस ने जमीन पर कड़ी मेहनत कर मुकाम तैयार किया है। दूसरी ओर समाजवादी पार्टी के सूत्रों का कहना है कि सपा केवल इंतजार कर रही। कांग्रेस नेताओं की बयानबाजी को नजरअंदाज कर पार्टी इस बात का इंतजार कर रही कि राहुल गांधी, प्रियंका गांधी या मल्लिकार्जुन खड़गे कब औपचारिक बातचीत के लिए आगे आते हैं। सपा का मानना है कि ऐसे बयानों से सिर्फ गठबंधन को नुकसान पहुंचता है। सपा कांग्रेस को 50 से 70 के बीच सीटें देने पर राजी हो सकती है, लेकिन अगर कांग्रेस इससे ज्यादा मांगती है तो उसे यह बताना होगा कि ज्यादा सीटों पर लड़ने का आधार क्या है, उनके पास मजबूत उम्मीदवार कौन हैं, जाति और धर्म का समीकरण क्या बैठेगा और किन मुद्दों के दम पर चुनाव जीता जाएगा।
क्या गठबंधन बचेगा या टूटेगा?
सपा और कांग्रेस के नेता इंडिया गठबंधन के बरकरार रहने का दावा कर रहे। वैसे, दावों के बीच बीच-बीच में ऐसी बयानबाजी सामने आ जाती है, जिससे आशंका पैदा होने लगती है कि गठबंधन टिकेगा या नहीं। इन तमाम बयानों के बीच अब तक दोनों दलों के बीच औपचारिक बैठक का जिक्र सामने नहीं आया है। यह देखना वाकई दिलचस्प होगा कि कांग्रेस बातचीत के जरिए सपा से कितनी ज्यादा सीटें हासिल कर पाती है और सपा किस तरह कांग्रेस को मनाकर एक निश्चित दायरे में रोक पाती है।