Ayodhya Assembly Election 2027 : वर्ष 2024 के लोकसभा चुनावों के अंतिम चरण का मतदान 1 जून की शाम को जैसे ही थमा, टीवी स्क्रीन पर एग्जिट पोल के नतीजे तैरने लगे। उन तमाम सर्वे रिपोर्ट्स में उत्तर प्रदेश के अंदर भाजपा (BJP) की आंधी और शानदार जीत का दावा किया जा रहा था। हर एक एग्जिट पोल भाजपा गठबंधन को यूपी में 60 से अधिक सीटें मिलने की उम्मीद जता रहा था। मगर, जब 4 जून को असली नतीजे सामने आए तो राजनीतिक गलियारों में भूचाल आ गया। भाजपा राज्य में सिमटकर महज 33 सीटों पर रह गई। पार्टी को 29 सीटों का भारी नुकसान झेलना पड़ा। इसमें भी सबसे बड़ा तथा ऐतिहासिक झटका उसे भगवान श्रीराम की नगरी अयोध्या (फैजाबाद लोकसभा क्षेत्र) में लगा। अयोध्या से लगातार 3 बार सांसद रहे भाजपा के दिग्गज नेता लल्लू सिंह को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा और समाजवादी पार्टी (SP) ने बाजी मार ली।
अयोध्या विधानसभा सीट पर गरमाई सियासत
लोकसभा चुनाव रिजल्ट को करीब 2 साल बीत गए हैं। मगर, फिर अयोध्या की राजनीति देशभर की सुर्खियों में है। सीएम योगी आदित्यनाथ और समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के बीच अब अयोध्या विधानसभा सीट से खुद चुनाव मैदान में उतरने को लेकर जुबानी जंग छिड़ गई है। दोनों दलों के शीर्ष नेतृत्व के साथ-साथ कार्यकर्ताओं के बीच भी इस सीट को लेकर बयानों के तीर खूब चल रहे हैं। पिछले लगभग तीन दशकों से अयोध्या में भगवा दल का दबदबा कायम रहा है, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में फैजाबाद सीट हाथ से निकल जाने के बाद समाजवादी पार्टी के हौसले सातवें आसमान पर हैं।
फैजाबाद लोकसभा और अयोध्या विधानसभा का समीकरण
बता दें, अयोध्या विधानसभा सीट फैजाबाद लोकसभा क्षेत्र में है। इस लोकसभा क्षेत्रांतर्गत 5 विधानसभा हैं। बीते 30 साल के चुनावी इतिहास को खंगाला जाए तो इस क्षेत्र में अधिकांश समय बीजेपी का ही परचम लहराया है। वैसे, अलग-अलग विधानसभा चुनावों के दौरान भाजपा के वोट शेयर और जीत के अंतर में समय-समय पर उतार-चढ़ाव आते रहे हैं। इन सबके बीच अब सबसे बड़ा सवाल है कि क्या 2027 के विधानसभा चुनाव में भाजपा अयोध्या में खोई पकड़ और वर्चस्व को वापस पा सकेगी।
पिछले सात चुनावों के नतीजे और आंकड़ों की कहानी
साल 1991 : उस दौर में राम जन्मभूमि आंदोलन अपने चरम पर था। अयोध्या सीट पर भाजपा प्रत्याशी लल्लू सिंह ने प्रचंड जीत हासिल की थी। उन्हें कुल 51.3% वोट मिले थे। उन्होंने 30400 मतों से चुनाव जीता था।
साल 1993 : बाबरी मस्जिद गिराए जाने के कुछ ही महीनों बाद हुए विधानसभा चुनाव में लल्लू सिंह ने अपनी सीट बचाने में कामयाबी हासिल की। हालांकि, इस बार पार्टी का वोट प्रतिशत गिरकर 47.24% पर आ गया। जीत का मार्जिन भी घटकर 9238 वोटों रह गया। इसके बाद भी लल्लू सिंह लगातार चुनाव जीतते रहे, लेकिन भाजपा के वोट शेयर में निरंतर गिरावट दर्ज की जाती रही।
साल 1996 : इस चुनाव में पार्टी का वोट शेयर घटकर 45.61% रह गया।
साल 2002 : यह आंकड़ा और नीचे खिसकते हुए 38.72% पर पहुंच गया।
साल 2007 : इस चुनाव में भाजपा को लगभग 37% वोट ही मिल पाए।
साल 2012 में पलटा था सियासी पासा
उत्तर प्रदेश की राजनीति में वर्ष 2012 का विधानसभा चुनाव बड़ा फेरबदल लेकर आया था। उस समय मायावती के नेतृत्व वाली बहुजन समाज पार्टी (BSP) सरकार के खिलाफ जनता में गहरी नाराजगी थी। इस चुनाव का फायदा उठाते हुए समाजवादी पार्टी ने अयोध्या से पवन पांडेय को मैदान में उतारा। पवन ने भाजपा के दिग्गज नेता लल्लू सिंह को 5404 वोटों से हरा दिया। उस चुनाव में पवन पांडेय के खाते में 28.74% वोट आए। भाजपा का वोट प्रतिशत लुढ़ककर 26% तक पहुंच गया था। यह परिणाम भाजपा के लिए बड़े झटके से कम नहीं था, क्योंकि लंबे अरसे के बाद उन्हें अयोध्या विधानसभा सीट गंवानी पड़ी थी।
साल 2017 और 2022 के चुनावी आंकड़े
साल 2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने एक बार फिर वापसी करते हुए अयोध्या सीट पर भगवा फहराया। पार्टी के उम्मीदवार वेद प्रकाश गुप्ता ने 49.56 प्रतिशत मत हासिल किए और सपा के पवन पांडेय को 50,440 वोटों के भारी-भरकम अंतर से करारी मात दी। इसके बाद 2022 के विधानसभा चुनाव में भी वेद प्रकाश गुप्ता ने जीत का सिलसिला जारी रखा। मगर, इस बार मुकाबला कड़ा और नजदीकी हो गया। भाजपा को 49% वोट मिले, मगर जीत का अंतर भारी रूप से घटकर केवल 19990 वोट रह गया। दूसरी तरफ सपा के पवन पांडेय का वोट प्रतिशत उछलकर 40.4% पहुंच गया। साफ है कि 2017 की तुलना में 2022 में भाजपा की जीत का मार्जिन काफी कम हुआ और समाजवादी पार्टी ने अपनी स्थिति मजबूत कर ली।
क्या जातीय समीकरण बीजेपी के पक्ष में नहीं हैं?
राम मंदिर के भव्य निर्माण के बाद यह आम धारणा बन गई थी कि 2024 के लोकसभा चुनाव में अयोध्या में भारतीय जनता पार्टी रिकॉर्ड तोड़ बहुमत से जीत दर्ज करेगी। लेकिन जब नतीजे आए तो पार्टी को अप्रत्याशित झटका लगा और समाजवादी पार्टी ने बाजी मार ली। सपा उम्मीदवार अवधेश प्रसाद ने भाजपा के लल्लू सिंह को चुनाव हरा दिया। इस हार-जीत के पीछे मुख्य रूप से जटिल जातीय समीकरणों को जिम्मेदार माना जा रहा है। वैसे, एक दिलचस्प तकनीकी पहलू है कि फैजाबाद लोकसभा सीट हारने के बावजूद भाजपा अकेली अयोध्या विधानसभा क्षेत्र में 4667 वोटों की बढ़त पर रही थी। इसके विपरीत समाजवादी पार्टी ने फैजाबाद लोकसभा की बाकी चार अन्य विधानसभा सीटों-दरियाबाद, रुदौली, मिल्कीपुर एवं बीकापुर में बढ़त बनाकर बाजी अपने पाले में खींच ली थी। अब 2027 के रण से पहले फिर अयोध्या के जातीय ताने-बाने पर बहस तेज है।
जातीय समीकरण और स्थानीय मुद्दे
अयोध्या विधानसभा सीट के चुनावी नतीजों में हमेशा से जातीय ताना-बाना अहम भूमिका निभाता आया है। इस इलाके में दलित मतदाताओं की संख्या अच्छी खासी है। इसके अलावा ब्राह्मण, मुस्लिम और यादव मतदाता भी बेहद निर्णायक हैं। पारंपरिक रूप से मुस्लिम और यादव वोट बैंक को समाजवादी पार्टी का कोर वोटर माना जाता है। दूसरी ओर भाजपा को सवर्ण जातियों के साथ कुर्मी, निषाद, मौर्य तथा राजभर जैसी तमाम पिछड़ी जातियों के वर्गों का मजबूत समर्थन मिलता रहा है। इस बार समाजवादी पार्टी फिर स्थानीय ब्राह्मण चेहरे पवन पांडेय को आगे बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रही। ऐसे में भाजपा के सामने परंपरागत सवर्ण वोटों को एकजुट बनाए रखने की बड़ी चुनौती होगी।
स्थानीय समस्याएं मुख्य एजेंडा
अयोध्या में इन जातीय समीकरणों के अलावा स्थानीय समस्याएं भी चुनाव का मुख्य एजेंडा बनने की ओर बढ़ रहीं। 2024 के लोकसभा चुनाव में हार मिलने के बाद शहर की बुनियादी और स्थानीय समस्याओं पर भी लोगों का ध्यान केंद्रित हुआ है। दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी लोकसभा चुनाव की ऐतिहासिक जीत और 2022 के विधानसभा चुनाव में मिले बढ़े हुए जन समर्थन के बूते पर 2027 के दंगल में अपनी सियासी जमीन और अधिक मजबूत करने के पूरे प्रयास में जुटी है। अयोध्या में इन जातीय समीकरणों के अलावा स्थानीय समस्याएं भी चुनाव का मुख्य एजेंडा बनने की ओर बढ़ रहीं। 2024 के लोकसभा चुनाव में हार मिलने के बाद शहर की बुनियादी और स्थानीय समस्याओं पर भी लोगों का ध्यान केंद्रित हुआ है। दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी लोकसभा चुनाव की ऐतिहासिक जीत और 2022 के विधानसभा चुनाव में मिले बढ़े हुए जन समर्थन के बूते पर 2027 के दंगल में अपनी सियासी जमीन और अधिक मजबूत करने के पूरे प्रयास में जुटी है।